Monday, June 25, 2012

Chinese Officials Likely to Visit India to Sort out Rapeseed Meal Contamination Issue




MUMBAI--Chinese officials are likely to visit India by the end of July to sort out an issue regarding contaminated rapeseed meal, the Solvent Extractors Association of India said Friday.

China, once the fourth-largest oilmeal importer from India, banned oilmeal imports from the South Asian nation in January after discovering traces of a hazardous chemical called malachite green in some rapeseed meal shipments.

Subsequently, the Indian trade body identified green dye used in the packing material as the source of the contamination and urged the exporters to stop using it.

The Solvent Extractors Association also invited officials from China's General Administration of Quality Supervision, Inspection and Quarantine to visit Indian oilmeal crushing plants.

A visit by Chinese officials may lead to the resumption of the trade if they are satisfied with the packing process. Japan, Vietnam and South Korea are the other major oilmeal importers from India.

India's oilmeal exports to China fell about 34% to 354,405 metric tons in the last fiscal year that ended March 31, while total exports increased about 8% to 5.5 million tons.

Indian exporters are now looking at other destinations such as the Middle East to increase shipments following the Chinese ban.

Saturday, December 24, 2011

ठंड ने रबी फसल की उम्मीद बढ़ाई

चंडीगढ़ December 22, 2011

क्षेत्र में यह चरण वर्षा रहित रहने के बावजूद कृषि अधिकारियों का कहना है कि मौसम की वर्तमान दशाएं गेहूं और अन्य रबी फसलों के लिए उपयुक्त हैं। हालांकि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि न्यूनतम तापमान के निचले स्तर पर पहुंचने की स्थिति में सरसों और अन्य सब्जियों को नुकसान पहुंच सकता है। सीसीएस हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में शोध निदेशक डॉ. आर पी नरवाल ने कहा कि मौसम की वर्तमान स्थितियां अच्छी हैं। हालांकि न्यूनतम तापमान गिरने की स्थिति में यह नुकसानदेह हो सकता है। मौसम विभाग के अधिकारियों ने कहा कि आने वाले दिनों में क्षेत्र का न्यूनतम तापमान तापमान गिर सकता है। हरियाणा में एक कृषि अधिकारी ने बताया कि शून्य से नीचे तापमान सरसों के निचले भाग में तने को प्रभावित करता है, जिससे फसल को नुकसान को पहुंचता है। हरियाणा में इस साल 5.26 लाख हेक्टेयर में सरसों की बुआई की गई है, जबकि पिछले साल इसका रकबा 5.04 लाख हेक्टेयर था। तापमान के शून्य से नीचे जाने पर यह सरसों के अलावा सब्जियों के लिए भी नुकसानदेह है। हालांकि राज्य के कृषि अधिकारियों ने कहा कि मौसम की वर्तमान दशाएं गेहूं की फसल के लिए अनुकूल हैं। (BS Hindi)

Friday, December 23, 2011

बनेगा खाद्य पैकिंग का स्टैंडर्ड सिस्टम


नमकीन, चिप्स और अन्य खाद्य पदार्थ 1 जुलाई 2012 से उपभोक्ताओं को 18, 39, 48 या फिर 57 ग्राम में नहीं मिलेंगे। सरकार खाद्य पदार्थों की पैकिंग के लिए पूरे देश में स्टैंडर्ड सिस्टम लागू करने जा रही है। इसके बाद कंपनियों को पैकिंग सीधे तौर पर जैसे 10 ग्राम, 20 ग्राम, 60 ग्राम या फिर 90 ग्राम के आधार पर करनी होगी। उपभोक्ता मामले विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खाद्य पदार्थों की पैकिंग में वस्तु की मात्रा तय नहीं होने से कंपनियां अपने हिसाब से मात्रा तय कर पैकिंग कर देती हंै। कई बार कंपनियां पैकेट की कीमत तो बराबर रखती हैं लेकिन पैकेट के अंदर रखे पदार्थ की मात्रा कम कर देती हैं। इसका उपभोक्ताओं को पता ही नहीं चल पाता। उपभोक्ता हितों का ख्याल रखते हुए इनकी पैकिंग के लिए स्टैंडर्ड सिस्टम लागू करने की योजना बनाई गई है। उन्होंने बताया कि कंपनियों को पैकेजिंग मैटेरियल और पुराने स्टॉक को समाप्त करने के लिए 30 जून 2012 तक का समय दिया जाएगा। इसके बाद 1 जुलाई 2012 से देशभर में स्टैंडर्ड सिस्टम लागू हो जायेगा। उन्होंने बताया कि डिब्बाबंद वस्तु अधिनियम के प्रावधान और माप-तौल मानक (पैकेज्ड वस्तु) नियम, देशभर में सितंबर 1977 से लागू हंै। 17 जुलाई 2006 को अधिसूचना और नियमों की समीक्षा की गई तथा उपभोक्ताओं के हितों के लिए नए प्रावधान लागू किए गए। इसके आधार पर वैट के अंतर्गत शामिल खुदरा विक्रेताओं को बेची गई चीजों की कीमत एवं भार की लिखित सूचना कंपनियों को पैकेट पर छापनी होती है। साथ ही प्रत्येक पैकेट पर कंपनी का नाम, पता और टेलीफोन नंबर लिखना होता है ताकि उपभोक्ता अपनी शिकायतों की सूचना दे सकें

तौल और माप

तौल और माप मानक अधिनियम, 1956 के अंतर्गत देश में मैट्रिक प्रणाली पर आधारित माप-तौल के एक समान मानक बनाए गए। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में तौल और माप इकाई इस विषय से सम्बंद्ध सभी गतिविद्धियों के लिए एक प्रमुख एजेंसी है।

अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली की यूनिटों की स्थापना तथा अपने कानूनों को अन्तर्राष्ट्रीय पद्धतियों के अनुरूप बनाने और कुछ कमियों को दूर करने के लिए 1956 के अधिनियम के स्थान पर एक व्यापक कानून माप-तौल मानक अधिनियम, 1976 लाया गया। नए कानून में अन्य बांतों के अलावा वस्तुओं की डिब्बाबंदी के बारे में नियम बनाए गए हैं ताकि उचित व्यापार प्रथाएँ स्थापित हों। डिब्बाबंद वस्तु अधिनियम के प्रावधानों और माप-तौल मानक (पैकेज्ड वस्तु) नियम, 1977 जैसे सम्बद्ध नियम सितंबर 1977 से लागू हैं। पैकेटबंद वस्तुओं के बारे में अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार फुटकर बिक्री के लिए पैकेटबंद हर वस्तु पर वस्तु का नाम, उत्पादक या पैकेट बंद करने वाले का नाम और पता, वस्तु की वास्तविक मात्रा, पैकेटबंदी विनिर्माण का महीना, वर्ष और बिक्री मूल्य आदि लिखा होना जरूरी है। खुदरा बिक्री मूल्य की अनिवार्य घोषणा सभी करों सहित एम.आर.पी. के रुप में दी जाती हैं। 17.07.2006 की संशोधित अधिसूचना और नियमों की समीक्षा की गई। उपभोताओं के हितों में नये प्रावधान लागू किये गए हैं। 1. वैट के अंतर्गत शामिल खुदरा विक्रेताओं को बेचे गये चीजों की कीमत एंव भार की लिखित सूचना छापनी होगी। 2. प्रत्येक पैकेट पर नाम, पता, टेलीफोन नं. लिखा होगा ताकि उपभोक्ता अपनी शिकायतों की सूचना दे सकें।
वर्ष 1976 के अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत उत्पादन शुरू करने से पहले भार और माप उपकरणों के सभी माँडलों की मंजूरी ली जानी चाहिए। तौल और माप (माँडलों की मंजूरी) नियम, 1987 के मानकों के अनुरूप हैं या नहीं। यह नियम 1987 से प्रभावी है।
संविधान के 42वें संशोधन से तौल और मापों के प्रवर्तन का विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में आ गया। देशभर में प्रवर्तन में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए एक केंद्रीय अधिनियम-तौल और माप (प्रवर्तन) अधिनियम, 1985 लागू किया गया। इस अधिनियम में व्यापारिक सौदों व औद्योगिक उत्पादन तथा जन-स्वास्थ्य संरक्षण और मानव सुरक्षा संबंधी कार्यों में प्रयुक्त किए जाने वाले तौल, माप तथा तौल/माप यंत्रों के बारे में प्रभावशाली वैधानिक नियंत्रण के प्रावधान शामिल हैं।
भारत अन्तर्राष्ट्रीय विधि माप विज्ञान संगठन का सदस्य है। इस संगठन की स्थापना वैधानिक माप विज्ञान (तौल और माप) से संबंधित कानूनों में विशव व्यापार में एकरूपता लाने के लिए की गई थी ताकि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सुगमता और व्यावहारिक रूप से चल सके।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के वैधानिक मानकों का अंशांकन की सुविधा और सेवाएं प्रदान करते हैं। तौल और माप उपकरणों के माडल यानी प्रतिदर्शी अनुमोदन परीक्षण के लिए भी ये मान्यताप्राप्त प्रयोगशालाएं हैं। पूर्वोत्तर राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नौवीं पंचवर्षीय योजना में गुवाहाटी में एक प्रयोगशाला स्थापित करने का काम शुरू किया गया। कार्य लगभग पूरा हो चुका है।
मंत्रालय के अंतर्गत रांची स्थित भारतीय वैधानिक माप विज्ञान संस्थान, माप विज्ञान के कानूनी तथा सम्बद्ध विषयों का प्रशिक्षण देता है। राज्यों के प्रवर्तन अधिकारीयों के अलावा कई अफ़्रीकी, एशियाई और लातिनी अमरीकी देशों के प्रतिनिधि संस्थान द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। वर्ष 2005-07 के दौरान 8.1 करोड़ की राशि राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को अनुदान के रूप में दी गई। 2007-08 में द्वितीयक मानक भार प्रणाली के 59 सेटों और तौलकांटों की जांच करने वाले के 17 मोबाईल किटों की आपूर्ति पूरी कर ली गई है। संस्थान की गतिविधियों को पुनः केंद्रित करने के लिए ताकि इसका जनादेश ज्यादा प्रभावी तरीके से पूर्ण हो, और इसे उत्कृष्टता का एक केंद्र बनाने के लिए भारतीय प्रबंधन संस्थान में एक अध्याय जोड़ दिया गया है।

खाद्य तेलों की पैकिंग किलो में होगी

बदलाव क्यों

इस समय किलोग्राम और लीटर में पैकिंग से ग्राहकों में भ्रम
लीटर की पैकिंग में वजन के लिहाज से कम तेल मिलता है
पैकिंग की एकरूपता से ग्राहक मूल्य का सही आकलन कर पाएंगे

केंद्र सरकार खाद्य तेलों की पैकिंग मात्रा के बजाय वजन यानि किलोग्राम में करने की अनिवार्यता लागू करने पर विचार कर रही है। उपभोक्ताओं के हितों के साथ ही पैकिंग में एकरूपता लाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। पॉलीथीन, जार या फिर टिन में खाद्य तेलों की पैकिंग किलो में किए जाने की योजना है लेकिन टेट्रा पैक में पैकिंग करने वाली कंपनियों को लीटर में खाद्य तेल बेचने की अनुमति पहले की तरह जारी रहेगी।

उपभोक्ता मामले विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खाद्य तेलों की पैकिंग कंपनियां किलो और लीटर में करती हैं जिससे उपभोक्ताओं में भ्रम की स्थिति बनी रहती है।

इसीलिए खाद्य तेलों की पैकिंग किलो में करने को अनिवार्य बनाया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होगी। उन्होंने बताया कि कंपनियों को पुराना स्टॉक समाप्त करने के लिए छह महीने का समय दिया जाएगा। इस आशय की अधिसूचना जल्दी ही जारी की जाएगी।

उन्होंने बताया कि खाद्य तेलों की पैकिंग इस समय कंपनियां किलो और लीटर के आधार पर कर रही है। ऐसे में किलो में तो उपभोक्ताओं को पूरा 15 किलो खाद्य तेल मिल जाता है लेकिन लीटर के आधार पर उपभोक्ता को एक टिन में 13.65 किलो खाद्य तेल ही मिल पाता है। इसी तरह से एक लीटर की पैकिंग में 910 ग्राम खाद्य तेल पैक किया जाता है। सरकार उपभोक्ताओं के लिहाज से ऐसा कदम उठाने पर विचार कर रही है

खाद्य सुरक्षा विधेयक

December 20, 2011

मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। इसमें 75 फीसदी ग्रामीण आबादी को ज्यादा सब्सिडी वाला भोजन उपलब्ध कराने के लिए सांविधिक अधिकार चाहा गया है। इसमें से 46 फीसदी को 'वरीयता' देने की बात कही गई है जो गरीबी रेखा के नीचे बसर करते हैं। इतना ही नहीं शहरी आबादी का 50 फीसदी भी इसमें शामिल किया जाना है जिसमें से 28 फीसदी वरीयता प्राप्त होंगे। ध्यान देने योग्य बात है कि विधेयक के प्रावधानों में शामिल जनसंख्या राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंशा के मुताबिक नहीं है। अगर ऐसा होता तो इसमें और अधिक लोग शामिल होते और इसका क्रियान्वयन मुश्किल होता। इसके बावजूद यह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के उन शुबहों को पूरी तरह दूर कर पाने में नाकाम रही है जो उसने इसके कारण पडऩे वाले वित्तीय बोझ के बारे में जताए हैं। इसके प्रावधानों के मुताबिक चावल 3 रुपये किलो, गेहूं 2 रुपये किलो और मोटा अनाज 1 रुपये किलो की दर से वितरित करने होंगे, जबकि इनकी खरीद की कीमत इससे कई गुना ज्यादा होगी। जाहिर है ऐसे में खाद्य सब्सिडी बिल बेहद ऊंचे स्तर तक पहुंच जाएगा। एक ओर जहां खाद्य मंत्रालय का केंद्रीय सब्सिडी बिल का अपेक्षाकृत संकुचित आकलन 60,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 95,000 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है वहीं विश्लेषकों का अनुमान है कि यह 100,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है। एक बार अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन, बढ़ती खरीद कीमत, राज्यों के कर, मंडी शुल्क और ढुलाई तथा वितरण लागत आदि जोड़े जाने के बाद वास्तविक सब्सिडी बिल इसका दोगुना तक हो सकता है। इस बीच लागत में हिस्सेदारी और क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकारों की अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा, अनेक राज्य पहले ही कुछ तबकों को 2 रुपये और 1 रुपये प्रति किलो की दर पर अनाज मुहैया करा रहे हैं। यह कीमत विधेयक में उल्लिखित दर से भी कम है। ऐसा लग सकता है कि संप्रग-2 1970 के दशक में लौटने की कोशिश कर रहा है लेकिन इंदिरा गांधी भी खाद्य कारोबार का राष्ट्रीयकरण करने में नाकाम रही थीं। हालांकि बेहद कड़ाई से लिखे इस कानून में भी राज्यों में अनाज उत्पादन की मात्रा वांछित करके एक तरह से राष्ट्रीयकरण की कोशिश की गई है। खुले बाजार में कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि सरकारी खरीद से कम ही अनाज बचेगा। ऐसे में विधेयक यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि जो परिवार गरीब नहीं हैं, वे महंगे अनाज पर निर्भर न रहें? जैसा कि कई राज्यों ने इंगित किया है- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) खराब हो चुकी है और यह कुल क्षमता का दो तिहाई ही सही ढंग से अंजाम दे पाती है। विधेयक का मौजूदा स्वरूप इसमें सुधार की कोशिशों पर बुरा असर ही डालेगा। भोजन के अधिकार को लागू करने में राज्य सरकारों की अहम भूमिका है और अगर उनके पास कोई वैकल्पिक विचार हो तो उन्हें खाद्य सुरक्षा को अपने तरीके से सुनिश्चित करने देना चाहिए। इसके अलावा अनाज की कोई कानूनी कीमत भी तय नहीं की जानी चाहिए। एन टी रामराव ने आंध्र प्रदेश में 1983 में 2 रुपये किलो अनाज देने की घोषणा की थी। उस कीमत को आखिर वर्ष 2011 में कानूनी मान्यता क्यों दी जानी चाहिए? बेहतर कानूनों को लागू करने के लिए थोड़े बहुत परिवर्तन की आवश्यकता होती है वरना वे उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे। अब चूंकि यह विधेयक समिति के जरिये सदन की राह ले चुका है, ऐसे में इस सिद्घांत को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Wednesday, August 3, 2011

Global Soybean Output To Fall; 2011-12 Trade Records Likely - IGC

Aug 1 2011 3:16PM 

 

SINGAPORE (Dow Jones)--Global soybean production is expected to fall 1% to 263.4 million metric tons in the marketing year that starts October 1 due to reduced planting in the U.S. and China, the International Grains Council said in its monthly report for July. 

Due to reduced planting, and based on earlier yields, the IGC expects U.S. soybean production to fall to 87.8 million tons in 2011-12 from 90.6 million tons this year. U.S. soymeal exports may fall 7% to 7.8 million tons next year. 

A shift in acreage towards corn may drag down China's soybean output to 14 million tons from 15.2 million tons in 2010-11. 

The preliminary forecast for India's soybean production is 11.5 million tons in 2011-12 down from 12.6 million tons this year. 

Increased animal feed demand in Asia may boost global soybean trade to a record 97.3 million tons in 2011-12, up 2.9 million tons from year earlier, especially in China, where domestic output is expected to fall. 

China's soybean imports could rise 6% to a record 57 million tons in 2011-12, the IGC said. The European Union's soybean imports are likely to be little changed at 13.1 million tons. 

Global soymeal trade is likely to rise 2% to a record 60.1 million tons. 

Reduced rapeseed supply due to bad weather will increase the EU's soymeal imports to a four-year high of 23.6 million tons in 2011-12, up 400,000 tons from year earlier. 

EU's rapeseed output is forecast to fall 9% to a four-year low of 18.5 million tons. Germany's production may fall 25%. Rapeseed yields in Ukraine have also suffered bad weather. 

As a result, EU's rapeseed imports may rise 20% to 3.0 million tons. 

Even though global plantings of rapeseed are projected 6% higher on year in 2011-12 production will be almost un