
मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान के लिए राष्ट्रीय केंद्र (एनसीएमआरडब्ल्यूएफ) के निदेशक डॉ. एस. सी. कार का कहना है कि पूर्वी-मध्य अरब सागर और उससे सटे इलाके के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बना हुआ है। इस कारण पश्चिम तट पर तेज बारिश की संभावना है। डॉ. कार के मुताबिक सभी परिस्थितियां मानसून के महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के अन्य इलाकों में आगे बढ़ने के अनुकूल हैं। इन राज्यों के जिन इलाकों में फिलहाल बारिश नही हुई हैं, वहां भी अगले 24 से 48 घंटों में बारिश की संभावना है।
मानसून की देरी से खरीफ की फसलों में जताए जा रहे नुकसान की भरपाई संभव है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के एग्रोनोमी विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शिवाधर मिश्र का कहना है कि खरीफ के मौसम की प्रमुख फसल धान है और फिलहाल बारिश के इंतजार में अधिकतर पौध अभी नर्सरी में ही है। डॉ. मिश्र का कहना है कि आमतौर पर नर्सरी से 20-25 दिनों में पौध निकालकर उसकी खेत में रोपाई कर दी जाती है। लेकिन मानसून में हुई देरी के कारण पौध की आयु अधिक हो गई है। डॉ. मिश्र का कहना है कि धान के पौधे में 16-17 कल्ले अच्छे माने जाते हैं, लेकिन अगर सही समय पर रोपाई न हो पाए तो कम कल्ले फूटने से पैदावार में कमी आ सकती है। इसके लिए डॉ. मिश्र का कहना है कि किसान खेतों में दो पौध एक साथ लगाने की बजाय तीन पौध लगाएं जिससे नुकसान की भरपाई हो सकेगी।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने फिलहाल किसानों को पछेती किस्मों की बुवाई की सलाह नहीं दी है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जुलाई तक मानसून नहीं पहुंचता है तो इन किस्मों की आवश्यकता बढ़ जाएगी।
उधर, वित्तीय क्षेत्र की वैश्विक हस्ती सिटी की मुख्य अर्थशास्त्री रोहिणी मल्कानी ने कहा है कि देश के जलाशयों के जल स्तर में कमी आने के साथ मानसून के खराब रहने से न सिर्फ आर्थिक विकास दर प्रभावित होगी बल्कि गरीबों को खाद्य सुरक्षा की गारंटी देने वाली यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पर भी इसका बुरा असर होगा। 1 जून से 17 जून के बीच बारिश में 45 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिससे देश भर के जलाशयों का जल स्तर लगातार कम होता जा रहा है।
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