अंडमान और केरल तट पर मानसून के जल्दी पहुंचने की वजह से जो शुरुआती खुशी थी, वह अब उसमें देर होने की वजह से चिंता में बदल गई है। इस समय भारतीय मौसम विभाग अप्रैल के अपने पुराने अनुमान पर कायम है कि इस साल 2009 के जून-सितंबर के दौरान बारिश आमतौर पर सामान्य (96 फीसदी) रहने की उम्मीद है। इस भविष्यवाणी से कुछ राहत मिलने की आस बंधी है।
यह सच है कि पिछले कुछ सालों में हमारी खेती की निर्भरता बारिश पर कुछ कम हुई है, लेकिन यह कमी उम्मीद से कम ही रही है। इसमें कोई शक नहीं कि देश के कई इलाकों में खरीफ (दालें और तिलहन) की बुआई में देर हुई और इसकी वजह कम बारिश ही है। अगर बारिश में और देर हुई तो फसल की बुआई प्रभावित होगी और उपज पर असर पड़ेगा। इससे आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा, जिससे बाजार में किल्लत बढ़ेगी। ऐसे दौर में जब खाद्यान्न की कीमतें पहले से ही ऊपरी स्तरों पर हैं, उपज में कमी से कीमतें और बढ़ेंगी। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति हालांकि पिछले सप्ताह 33 साल के निचले स्तर (-1.6 फीसदी) पर पहुंच गई है, लेकिन खाद्यान्न की कीमतें कम नहीं हुई हैं। इसलिए केंद्र सरकार द्वारा राहत के उपाय किए जाने स्वाभाविक ही हैं। इनमें सूखा रोधी बीज की आपूर्ति और जल रोधी बीज की आपूर्ति शामिल है। विभिन्न तरह के ये बीज कम और अधिक बारिश वाले इलाकों के लिए विकसित किए गए हैं
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