Thursday, October 29, 2009

दस लाख टन और चीनी आयात की मंजूरी दे सकती है सरकार


घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार 10 लाख टन अतिरिक्त चीनी (व्हाइट शुगर) के शुल्क मुक्त आयात को अनुमति दे सकती है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार सरकार ने पहले दस लाख टन चीनी के आयात की जो अनुमति दी थी उसमें से भारतीय कंपनियों द्वारा अभी तक करीब आठ लाख टन आयात के सौदे किए जा चुके हैं। इसमें से करीब तीन लाख टन चीनी भारत में आ चुकी है।उद्योग सूत्रों के अनुसार चालू पेराई सीजन वर्ष 2009-10 (अक्टूबर से सितंबर) में गन्ने की कमी से चीनी का उत्पादन घटकर 160 लाख टन ही होने की संभावना है जोकि वर्ष 2008-09 के 150 लाख टन से थोड़ा ज्यादा होगा। पिछले साल पेराई सीजन के शुरू में चीनी का करीब 100 लाख टन का स्टॉक बचा हुआ था लेकिन चालू पेराई सीजन के शुरू में स्टॉक मात्र 25-30 लाख टन का ही बचा होने का अनुमान है। देश में चीनी की सालाना खपत करीब 225-230 लाख टन की है। ऐसे घरेलू आवश्यकताओं के पूर्ति के लिए चालू सीजन में चीनी का आयात पिछले साल से ज्यादा हो सकता है।चीनी के उत्पादन में कमी के कारण ही पिछले सीजन भारतीय कंपनियों द्वारा करीब 50 लाख टन रॉ शुगर (गैर-रिफाइंड चीनी) के आयात सौदे किए गए थे जिसमें से करीब 26 लाख टन चीनी भारत में आ चुकी है। चालू पेराई सीजन में भी 45 से 50 लाख टन रॉ-शुगर का आयात होने की संभावना है।भारत में पहुंच आयातित चीनी का भाव बंदरगाह पहुंच 3,000 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा पड़ रहा है, इसलिए कंपनियां नये सौदे करने से परहेज कर रही हैं। चीनी की आयात अवधि पहले ही सरकार बढ़ाकर मार्च 2010 तक कर चुकी हैं। दिल्ली के चीनी व्यापारी सुधीर भालोठिया ने बताया कि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कम होने के कारण थोक बाजार में दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं। दिल्ली थोक बाजार में बुधवार को चीनी के भाव बढ़कर 3250 रुपये और एक्स-फैक्ट्री भाव 3100-3150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

पंजाब, हरियाणा में 261 लाख टन गेहूं उत्पादन की संभावना


केंद्र सरकार द्वारा अगले रबी सीजन में गेहूं का उत्पादन लक्ष्य बढ़ाए जाने के बाद पंजाब और हरियाणा ने भी तैयारी शुरू कर दी है। इन राज्यों ने गेहूं बुवाई के रकबा लक्ष्य कर दिया है। पंजाब को 146.60 लाख टन और हरियाणा को 114.62 लाख टन गेहूं उत्पादन की उम्मीद है। हालांकि इन दोनों ही राज्यों में धान की फसल लेट होने से गेहूं की बुवाई कम से कम पांच दिन पिछड़ सकती है। पंजाब में कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस साल हम 35 लाख हैक्टेयर में गेहूं बुवाई का लक्ष्य तय कर रहे हैं। इससे गेहूं उत्पादन करीब 146.60 लाख टन के करीब रह सकता है। पिछले साल वहां 35.26 लाख हैक्टेयर में 157.33 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। इसी तरह हरियाणा में 24.75 लाख हैक्टेयर में गेहूं बुवाई का लक्ष्य रखा गया है। इससे वहां 114.62 लाख टन गेहूं का उत्पादन हो सकता है। हरियाणा में पिछले साल 24.62 लाख हैक्टेयर में 113.60 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। इस साल गेहूं का बुवाई रकबा बढ़ने की संभावना इस वजह से भी है कि सरकार ने प्रमाणित बीजों के वितरण पर सब्सिडी बढ़ा दी है। अब किसानों को इन बीजों पर नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन के तहत 200 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा सब्सिडी मिलेगी। अगले रबी सीजन में किसानों को गेहूं के प्रमाणित बीज पर 700 रुपये प्रति क्विटंल या कीमत की 50 फीसदी (जो भी कम हो) सब्सिडी मिलेगी। पहले यह सीमा 500 रुपये प्रति क्विंटल थी।दूसरी ओर इन राज्यों में गेहूं की बुवाई एक नवंबर से शुरू होने की उम्मीद है और यह काम 20 नवंबर तक चलेगा। जबकि सामान्य रूप से वहां 25 अक्टूबर से 15 नवंबर तक बुवाई का काम होता है। पंजाब और हरियाणा के किसानों ने जिन खेतों से धान कटाई कर ली है वहां गेहूं की बुवाई की तैयारियां शुरू कर दी है।एक कृषि विशेषज्ञ के अनुसार गेहूं की बुवाई में कम से कम पांच दिन की देरी होगी। धान की अभी खेतों में कटाई चल रही है। सूखे के कारण यह फसल लेट हुई। पंजाब और हरियाणा में अच्छी क्वालिटी के बीज सुनिश्चित करने के लिए बीज की सुलभता सुनिश्चित कराई जा रही है। पंजाब मे 9.5 लाख क्विंटल और हरियाणा में 7.5 क्विंटल गेहूं की विभिन्न किस्मों के बीज सुलभ कराए जाएंगे।

Wednesday, October 28, 2009

CPO price: More positive than negative



In the third quarter of 2009, CPO prices averaged US$604/metric ton (MT), 9 percent lower than the Q2 average of $665/MT on the back of a six-month high reserve in Malaysia as production climbed to the highest level in 2009 at 1.49 million MT while August exports dropped 9.5 percent month-to-month to 1.32 million MT.

Entering the fourth quarter, there is an upward movement in the CPO price, averaging $600/MT in the first 14 days of Q4, mostly supported by the surge in oil price movements and weakening in the US dollar relative to other currencies.

However, this positive trend in the remaining part of Q4 is likely to be limited by the seasonality caused by the harvesting period. This has been seen in September's CPO production in Malaysia which grew 4.1 percent m-m with stock levels up 11.5 percent m-m to 1.58 million MT on the back of flat exports during the month.

Nevertheless, we expect CPO prices to perform better as we enter Q1 of 2010.

Several supporting factors are indicative of a strengthening of El Nino effects during winter in the northern hemisphere and this is most likely to peak at moderate strength, according to the National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA).

Even a moderate El Nino effect might impact negatively upon production of palm oil by around 5 to 10 percent according to industry sources.

This coupled with possible production decline due to normal seasonal factors in the first half of 2010 is likely to restrict supply of CPO.

From the demand side, support will come as India plans to continue importing CPO due to drought that has severely damaged its domestic edible oil crops.

Continuing economic recovery in the emerging markets like China and slowing contraction in the most advanced countries like the US and Japan will also help to boost demand for CPO.

Our discussion with a plantation company revealed an interesting development within the industry.

Contrary to the conditions in the last two years, whereby seed purchases for expansion would require waiting lists, current seeds demand is now depressed due to cash conservation by many plantation companies.

In fact, it is now possible to buy plenty of three-month-to-one-year old seeds that are ready to be planted without having to put the seeds in nurseries in the first year.

This translates into lower risks of failed seeds for plantation companies.

London Sumatra and Sampoerna Agro only sold 1.8 million seeds (-82 percent year-on-year) and 2.6 million seeds (-71 percent y-y) compared with last year when the two companies were able to sell 17.9 million and 18.4 million seeds respectively.

In our view, a slow down in new planting will decelerate production growth of CPO in the next three years.

Furthermore, a lower CPO price from its peak in the first half of 2008 has also forced plantation companies to reduce fertilizer applications on immature and mature estates, which eventually would also slow production growth.

A USDA report reveals that expected 2010 ending stocks will decline 12 percent y-y as production grows 5.4 percent, lower than the consumption growth rate of 5.9 percent.

Currently, our CPO price assumption is at $600/MT in 2009 (year-to-date average of $595/MT), rising to $700/MT in 2010 due to the above-mentioned issues, although there is some risk to our call in the form of strong soybean production in the US and Latin America on greater farm planting, with more area under cultivation.

However, at this stage of the cycle, we believe the positives continue to outweigh the negative factors within the Indonesian plantation sector.

Food prices show declining trend, says dept of consumer affairs



Wednesday, October 28, 2009 08:00 IST
Our Bureau, New Delhi

From last six months retail prices of wheat, groundnut oil, mustard oil, and vanaspati witnessed a declining trend in Delhi.

As per data collected by the department of consumer affairs of the ministry of consumer affairs, food & public distribution, the price of wheat came down by Re 1 from Rs 14 to Rs 13 per kg. Groundnut oil became cheaper by Rs 4 per litre while mustard oil recorded a decrease of Rs 5 per litre at Rs 61, down from Rs 66.

Further, Vanaspati prices registered a declining trend during the same period. Its price was Rs 51 per litre down from Rs 54. The dept also informed that the prices of pulses remained on higher side.

“In the meantime, PSUs (public sector undertaking) have contracted 3.02 lakh tonne of pulses. Out of which 2.23 lakh tonnes have arrived and 0.98 lakh tonnes have been disposed from the stocks with agencies up to October 7 2009,” the dept said in its statement.

Raid on oil depot


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ALLAHABAD: Close on the heels of Naini raids, where a joint team of health and police officials seized a godown on Monday, another joint team of

local health authority (LHA) and police on Tuesday raided Krishna Oil Depot located at Katra and collected samples of mustard oil, desi ghee, sugar and refined oil.

The team had to face wrath of the employees of the depot. However, presence of police force prevented the situation from going out of control. Chief food inspector Hari Mohan Srivastava said that the team has been collecting samples of mustard oil, desi ghee and refined oil after getting suspicious about its quality. The samples would be sent to laboratory in Lucknow for tests which would ascertain whether the products are adulterated or not.

The raid led to chaos in the market and hundreds of people gathered to know the cause behind the raid. The team also seized several containers and packets. The actual number of containers could not be ascertained till the filing of this report raid was continuing

इस बार कम होगा गेहूं का उत्पादन


अलीगढ़। आलू के निरंतर बढ़ते भाव से किसानों के चेहरे पर चमक आ गयी। आलू ने ऐसा लुभाया कि इस बार भी किसानों ने गेहूं के मुकाबले आलू की फसल बोने में अधिक रुचि दिखाई है। इस तरह गेहूं की अपेक्षा आलू का रकबा बढ़ने से यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले वक्त में गेहूं पर महंगाई की मार पड़ सकती है।
पिछले वर्ष जिले में गेहूं का उत्पादन रिकार्ड तोड़ हुआ था। दो लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल लक्ष्य की तुलना में दो लाख सात हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की बुवाई हुई थी। इसके सापेक्ष सात लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य एक हजार अस्सी रुपये निर्धारित किया था। जिला प्रशासन ने गेहूं क्रय केंद्र खोलकर किसानों का अनाज खरीद लिया। नगद धनराशि न मिलने की वजह से किसानों ने व्यापारियों के हाथ गेहूं बेच दिया। हालांकि जिला प्रशासन ने खरीद का अपना लक्ष्य पूरा कर लिया। मगर किसानों को अधिक लाभ नहीं मिला। इसके विपरीत आलू की बुवाई भी रबी फसल में होती है। दोनों की बुवाई में सिर्फ एक माह का अंतर होता है। इसलिए किसान एक फसल ही बो सकते हैं। पिछले वर्ष अधिक रिकार्ड उत्पादन की वजह रही कि आलू की बुवाई का क्षेत्रफल कम था। इसलिये रिकार्ड गेहूं का उत्पादन रहा। अब आलू का मूल्य अधिक मिलने की वजह से किसानों ने इसकी बुवाई का जिले में क्षेत्रफल बढ़ा दिया है। शासन ने आठ हजार पांच सौ हेक्टेयर जमीन में उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके विपरीत 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी बुवाई होने की संभावना है। इस बार शासन ने जिले में दो लाख पंद्रह हजार हेक्टेयर जमीन में गेहूं की बुवाई का लक्ष्य रखा है। उप कृषि निदेशक डा।ओमवीर सिंह ने बताया कि इस साल आलू की बुवाई अधिक हो रही है। पिछले वर्ष गेहूं फसल की बुवाई अधिक क्षेत्रफल में हुई थी।

अगले साल सितंबर तक चावल आयात पर शुल्क नहीं


नई दिल्ली : घरेलू बाजार में चावल की सप्लाई बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने चावल से आयात शुल्क हटाने का फैसला किया है। धान की फसल पर पहले सूखा और फिर बाढ़ की दोहरी मार पड़ने के कारण इस साल चावल उत्पादन में करीब 1।60 करोड़ टन तक कमी आने की आशंका है। घरेलू बाजार में चावल की किल्लत न हो, इसलिए सरकार ने सितंबर 2010 तक चावल आयात पर कोई शुल्क न वसूलने का फैसला किया है। केंद्रीयय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'यह अधिसूचित कर दिया गया है कि सितंबर 2010 तक चावल से आयात शुल्क (70 फीसदी) हटा दिया गया है।' एक कर विशेषज्ञ ने कहा कि आधे कूटे और पूरे कूटे (सेमी मिल्ड एंड होल मिल्ड) चावल से आयात शुल्क हटाया गया है। यह छूट पॉलिश और बिना पॉलिश, दोनों तरह के चावल पर लागू है।
सूत्रों ने बताया कि पिछले माह आयोजित एक बैठक में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में खाद्य मामलों पर गठित मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह (ईजीओएम) ने चावल से आयात शुल्क हटाने की सिफारिश की थी। मुद्रास्फीति नियंत्रण के उपायों के तहत सरकार ने 20 मार्च 2008 से 31 मार्च 2009 के बीच चावल के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी थी। हालांकि, 1 अप्रैल से आयात शुल्क को दोबारा लागू कर दिया गया था। सरकार ने चावल से आयात शुल्क हटाने का फैसला ऐसे वक्त में किया है, जब देश का आधा हिस्सा सूखे की चपेट है तो दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाढ़ का कहर बरपा है। इन इलाकों में मुख्य रूप से चावल की खेती होती है। धान की पैदावार को नुकसान पहुंचने के बाद पिछले चार महीनों में चावल की कीमतें 25 फीसदी बढ़ चुकी हैं। इससे पहले मुखर्जी ने कहा था कि सूखे और बाढ़ के कारण इस साल चावल उत्पादन में 1।60 करोड़ टन की गिरावट आ सकती है। 2008-09 में भारत में 9.91 करोड़ टन चावल का उत्पादन हुआ था। (ई टी हिन्दी

ड्यूटी फ्री चावल आयात की सरकार ने दी मंजूरी


देश में सूखा और बाढ़ के दोहरे संकट से खाद्यान्न उत्पादन गिरने की आशंका को देखते हुए बाजार में चावल की सुलभता बढ़ाने के लिए ड्यूटी फ्री आयात की मंजूरी दी है। सरकार ने चावल के आयात पर लगने वाली 70 फीसदी ड्यूटी अगले साल सितंबर तक के लिए समाप्त कर दी है। इस साल धान का उत्पादन 160 लाख टन गिरने का अनुमान है। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आयात शुल्क हटाने के संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। एक कर विशेषज्ञ ने कहा कि सेमी-मिल्ड व पूरी तरह तैयार चावल और पॉलिश्ड व नॉन पॉलिश्ड चावल पर ड्यूटी खत्म की गई है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई वाले खाद्यान्न पर बने अधिकार प्राप्त मंत्रीसमूह ने पिछले दिनों चावल के आयात पर शुल्क हटाने का फैसला किया था। इससे पहले सरकार ने मार्च 2008 से मार्च 2009 तक ड्यूटी फ्री चावल आयात की अनुमति दी थी। उस समय महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए यह कदम उठाया गया था। इसके बाद एक अप्रैल 2009 को दुबारा ड्यूटी लगा दी गई। मौजूदा सीजन में देश के आधे से ज्यादा हिस्से में सूखे का प्रकोप रहा। इसके बाद आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाढ़ ने फसल को नुकसान पहुंचाया। इससे मुख्य रूप से गर्मियों में बोई जाने वाली धान की फसल की पैदावार गिरने की आशंका पैदा हो गई।सूखा सहने वाली धान की नई वैरायटी तैयारभुवनेश्वर। सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) ने धान की एक ऐसी किस्म विकसित की है जो तीन सप्ताह तक बिना सिंचाई के सुरक्षित रह सकती है। बारिश की कमी से इस किस्म के धान की पैदावार प्रभावित नहीं होगी। सीआरआरआई के डायरेक्टर टी. के. आध्या ने बताया कि सहभागी नाम की इस वैरायटी को सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमोटी की ओर से दो दिन पहले मंजूरी मिल गई है। इस वैरायटी के धान की बुवाई करने पर किसानों को 35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की पैदावार मिल सकती है। वैज्ञानिकों ने इससे पहले इसी तरह की खासियत वाली कलिंगा वैरायटी का विकास किया था, जिसकी पैदावार 25 क्विंटल प्रति हैक्टेयर रहती थी। (डो जोंस) (बिज़नस भास्कर

महंगा हो सकता है खाद्य तेल का आयात


April 28, 2008
खाद्य तेलों पर आयात शुल्क खत्म किए जाने से घरेलू थोक बाजारों में खाद्य तेल 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक सस्ते हो गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह रुख ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रह सकता।
विशेषज्ञों ने कहा कि बाजार में अटकलें हैं कि दो महीने बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ सकती हैं। यद्यपि आयात शुल्क घटाए जाने से निजी कंपनियां आगामी महीनों के लिए और अधिक आर्डर जारी कर रही हैं, लेकिन वे मौजूदा स्तरों पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मोलभाव नहीं कर सकतीं क्योंकि जून के बाद कीमतों में तेजी आने की संभावना है।
साल्वेंट एक्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (एसईए) ने कहा है ' इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें स्थिर हैं। हालांकि व्यापारियों का अनुमान है कि कीमतें जून के बाद बढ़ सकती हैं।' लेकिन कारोबारियों का अनुमान है कि जून के बाद तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी।
एसईए का कहना है कि अप्रैल महीने में आयातित तेल की कीमत मार्च के मुकाबले स्थिर है। आयातित आरबीडी की कीमत 6.29 फीसदी की गिरावट के साथ 53,600 रुपये टन के स्टर पर पहुंच गयी है। उसी तरह कच्चे पामऑयल की कीमत 11 फीसदी की गिरावट के साथ 46,000 रुपये प्रति टन के स्तर पर आ गयी।
मूंगफली तेल की कीमत में 7।75 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है। अब इसके भाव 65,500 रुपये प्रति टन के स्तर पर आ गये हैं। वही सूरजमुखी तेल की कीमत 69,000 रुपये प्रति टन से गिरकर 57,000 रुपये प्रति टन हो गयी है। आयात शुल्क में कटौती के बाद पहले के मुकाबले तेल का आयात ज्यादा सस्ता हो गया है

Tuesday, October 27, 2009

चावल उत्पादन में हो सकती है कमी

नई दिल्ली। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने आशंका जताई है कि इस साल सूखा और बाढ़ दोनों आपदाओं के कारण 2008-09 के मुकाबले चावल का उत्पादन 1.6 करोड़ टन कम होगा।
मुखर्जी ने हालांकि भरोसा जताया कि अनाज की आपूर्ति में कोई कमी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि हमने अपेक्षाकृत ऊंची वृद्धि दर की होती, लेकिन सखा और बाद में कुछ हिस्सों में आई बाढ़ के असर ने कृषि की संभावनाओं और विशेष तौर पर खरीफ की फसल को उल्लेखनीय रूप से प्रभावित किया।
हालांकि वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद [पीएमईएसी] द्वारा चालू वित्त वर्ष लिए जाहिर 6.75 फीसदी की वृद्धि दर के अनुमान का समर्थन किया लेकिन उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक निराशाजनक दृष्टिकोण पेश किया। इससे पहले पीएमईएसी ने इस सप्ताह अनुमान जाहिर किया था कि खाद्य उत्पादन में इस सत्र में 1.1 करोड़ टन की गिरावट होगी।
भारत ने 2008-09 के खरीफ सत्र में 9.915 करोड़ टन का रिकार्ड उत्पादन किया था। उन्होंने कहा कि सितंबर के आखिरी सप्ताह तक हमारी उम्मीद थी कि शुरुआती रबी फसल, हरियाणा एवं पंजाब द्वारा फसलों की सुरक्षा और चावल अच्छी पैदावार से हालात कुछ ठीक होंगे। हमें उम्मीद थी कि चावल के उत्पादन में एक से 1.2 करोड़ टन की कमी होगा लेकिन अब लगता है कि चावल के उत्पादन में 1.5 से 1.6 करोड़ टन की कमी आएगी।
देश के आधे हिस्से में सूखे ने बुवाई प्रक्रिया को बाधित किया है जिससे धान की फसल की बुवाई में करीब 60 लाख हेक्टेयर की कमी आई और आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र ने खड़ी फसल को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। आंध्र जो चावल उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है वह सूखे से प्रभावित नहीं था लेकिन यह हाल में आई बाढ़ से प्रभावित हुआ।
मंत्री ने हालांकि कुछ प्रभावित क्षेत्रों में मुख्यमंत्रियों की पहल की प्रशंसा की जिन्होंने बिजली के लिए ज्यादा भुगतान किया ताकि सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जा सके और इस तरह नुकसान में कमी आई। मुखर्जी ने कहा कि इसलिए यदि आप बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब का देखें तो मुख्यमंत्रियों की सूझ-बूझ और दूरदेशी का भला हो, उन्होंने बहुत अधिक बिजली मुहैया कराई ताकि भूमिगत जल का उपयोग किया जा सके। उन्होंने फसलों की सुरक्षा की। इसलिए उतना नुकसान नहीं हुआ हालांकि प्रभावित जरुर हुआ।
इसी हफ्ते कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि पंजाब और हरियाणा में चावल का उत्पादन सूखे के बावजूद पिछले साल के स्तर पर बना रह सकता है। केंद्रीय भंडार में इन दोनों राज्यों को योगदान सबसे अधिक होता है। उन्होंने कहा कि देश में मांग पूरी करने के लिए अनाज का पर्याप्त भंडार है। अनाज का बड़ा भंडार गेहूं और चावल की रिकार्ड खरीद के कारण संभव हुआ। खरीद और वितरण की प्रमुख एजेंसी एफसीआई ने 2008-09 के विपणन सत्र [अक्टूबर से सितंबर] में 3।33 करोड़ टन चावल की खरीद की थी।

Saturday, October 24, 2009

Raids conducted at several places


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VARANASI: In continuation of the drive against food adulteration, the teams of district officials and police conducted raids at several places

and collected samples for testing on Friday.

A team raided the Daal unit in Lehartara area and sealed about 80 quintal `daal' after collecting samples. Another team raided an oil mill at Kazzakpura in Adampur area and sealed the godown with a stock of 1238 tins of mustard oil and 200 tins of palm oil after taking samples. The unit had no license for the production of palm oil. One Satosh Tiwari was detained in this connection.

Raids were also conducted at an oil trading unit at Shyam Bazar in Machhodari area and a flour mill in Pandeypur area, but no irregularity was found there.

Wheat and edible oil prices show declining trend


Friday, October 23, 2009
Ministry of Consumer Affairs, Food & Public Distribution

Wheat and edible oil prices show declining trend
15:0 IST
Retail prices of wheat, groundnut oil, mustard oil, and vanaspati witnessed a declining trend in Delhi in the last six months.

As per data collected by the Department of Consumer Affairs, the price of wheat came down from Rs. 14 to Rs.13 per kg.

Groundnut oil became cheaper by Rs. 4 per lt. while mustard oil recorded a decrease of Rs. 5 per lt. at Rs. 61, down from Rs. 66.

Vanaspati prices also registered a declining trend during the same period. Its price was Rs. 51 per lt. down from Rs. 54.

The prices of pulses, however, remained on higher side. In the meantime, PSUs have contracted 3.02 lakh tonne of pulses. Out of this 2.23 lakh tonne have arrived and 0.98 lakh tonne have been disposed from the stocks with these agencies upto 7th of October 2009.

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MP:SB:CP:commodity prices(23.10.2009)

Two members of family die of dropsy, eight taken ill



Kaushambi (UP), Oct 23 (PTI) Two members of a family died and eight others were taken seriously ill due to dropsy after they consumed adulterated mustard oil in Kalyanpur village here.

Ten members of a family had been ill since the past 15 days and were being treated for meningitis and measles, Chief medical officer (CMO) Dayaram Verma said today.

Their samples were sent for testing and they were admitted to Motilal Nehru hospital in Allahabad, he said.

Two children of the family aged ten and six years died yesterday while eight others were still undergoing treatment, he said, adding that samples of mustard oil have been taken from the shops in the village and its adjoining areas and sent for testing to Lucknow.

Friday, October 23, 2009

चीनी के दाम सर्वोच्च स्तर पर

नई दिल्ली October 22, 2009
त्योहारी मौसम खत्म होने के बावजूद चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी है। यह अपने सर्वोत्तम ऊंचाई पर पहुंच चुकी है।
गुरुवार को थोक बाजार में चीनी की कीमत 32.50 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गयी। डबल रिफाइंड चीनी के थोक भाव तो 33 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए। इसके साथ ही खुदरा बाजार में चीनी के दाम 36-37 रुपये प्रति किलोग्राम हो चुके हैं।
बाजार में तेजी के रुख को देखते हुए इस सप्ताह कीमत में कोई कमी होने की संभावना नजर नहीं आ रही है। बाजार में चीनी की आपूर्ति कम होने से उठाव में तेजी आ गयी है। गत बुधवार को कृषि मंत्री शरद पवार ने रिफाइंड चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अवधि नवंबर, 2009 से बढ़ाकर दिसंबर, 2010 तक करने की घोषणा की है। लेकिन इसका कोई असर चीनी बाजार पर नहीं पड़ा है।
सरकार 2009-10 के लिए 160 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगा रही है। जबकि सालाना घरेलू खपत 230-240 लाख टन है। अगस्त माह के दौरान थोक बाजार में चीनी की कीमत 32 रुपये प्रति किलोग्राम की रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गयी थी। लेकिन सरकारी सख्ती के बाद चीनी के थोक भाव 28-29 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए थे।
कारोबारी बताते हैं कि चीनी के दाम में गत 15 अक्टूबर से ही तेजी शुरू हो गयी थी। उस दिन यह कीमत 31-31.50 रुपये प्रति किलोग्राम तक हो चुकी थी। 16 अक्टूबर से चीनी मिलें बंद हो गयी थीं और गत 20 अक्टूबर को मिलें खुलने के बाद भी चीनी में तेजी का रुख जारी है।
कारोबारियों ने बताया कि कीमत तेज होने से उठाव में भी तेजी आ गयी है। क्योंकि कीमतों में और तेजी की आशंका के मद्देनजर उठाव ज्यादा होने लगता है। इन दिनों दिल्ली में उत्तर प्रदेश के मुकाबले महाराष्ट्र से चीनी की आपूर्ति ज्यादा हो रही है। थोक कारोबारियों के मुताबिक हर सप्ताह दिल्ली में महाराष्ट्र से दो रैक चीनी की आपूर्ति की जा रही है।
एक रैक में 20-30 हजार बोरी (1 बोरी = 100 किलोग्राम) चीनी होती है। वे यह भी कह रहे हैं कि बाजार में चीनी की आपूर्ति की लाइन सुचारू तरीके से नहीं चल रही है। यहां तक कि आयातित रिफाइंड चीनी की आपूर्ति भी अभी बाजार में नहीं हो रही है। सरकार के मुताबिक अब तक 3 लाख टन से अधिक रिफाइंड चीनी का आयात हो चुका है।
अक्टूबर माह के लिए सरकार ने 20 लाख क्विंटल चीनी का कोटा जारी किया है। जो कि एक माह के लिए पर्याप्त है। थोक व्यापारी चीनी मिल वालों से डिलिवरी लेते हैं। चीनी के दो प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश में गन्ने की पेराई अभी शुरू नहीं हुई है। यहां नवंबर माह में गन्ने की पेराई शुरू होगी।

किसानों की लागत बढ़ी पर पूसा धान का भाव पिछले साल के मुकाबले आधा


पूसा 1121 बासमती चावल को लेकर ईरान के साथ विवाद खत्म हो जाने पर भी किसानों को इस प्रीमियम किस्म के धान का भाव पिछले के मुकाबले साल बमुश्किल 50 फीसदी मिल पा रहा है। पिछले साल पंजाब और हरियाणा की मंडियों मे 3500 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिकी पूसा 1121 धान इस साल 1800 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रहा है। इस साल मानसून की देरी के कारण ज्यादा किसानों ने इस किस्म के धान की बुवाई की। इस धान की मंडियों में आवक तो बढ़ गई है लेकिन निर्यातक खरीद में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। निर्यातकों ने आशंका जताई है कि बासमती किस्म पूसा 1121 चावल का निर्यात इस साल कम रहेगा। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि ईरान में विवाद सुलझने के बाद पूसा 1121 बासमती चावल पर आयात शुल्क 21 से बढ़ाकर 42 फीसदी कर दी है। इससे ईरान को भारत से चावल का निर्यात घटेगा। वहीं पूसा 1121 को यूरोप में बासमती का दर्जा न मिलने से इसके निर्यात पर अधिक सीमा शुल्क देना पड़ रहा है। सेतिया का कहना है कि पिछले साल की तुलना में पंजाब और हरियाणा मंे पूसा 1121 का रकबा तकरीबन चार लाख हैक्टेयर बढ़ गया है। इससे उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। उधर मार्कफेड और हैफेड जैसी सरकारी एजेंसियों ने भी इस प्रीमियम धान की खरीद शुरू नहीं की है। करनाल मंडी के आढ़ती राजेंद्र ने बताया कि पिछले एक हफ्ते से पूसा 1121 की कीमतों में करीब 600 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आई है । करनाल मंडी में एक सप्ताह में भाव 600 रुपये गिरकर 1800 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। करनाल मंडी में इस धान के ढेर लगे हंै लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे हैं। इस मंडी में पूसा की रोजाना करीब फ्क् से फ्फ् हजार बोरी की है। पानीपत की समालखा मंडी के आढती शिव कुमार जैन के अनुसार आवक बढ़ते ही मंडियों में ग्राहक कम होने लगे हैं। उन्होंने भाव और गिरने की आशंका जताई है। इस साल बारिश की कमी होने के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई डीजल फूंककर करनी पड़ी। पानीपत में गांव बांध के किसान रणवीर सिंह धनकस और छाजपुर के राजेंद्र रावल पूसा के अपेक्षित भाव न मिलने से मायूस हैं। भाव आधे रह जाने से उनकी लागत निकलना भी मुश्किल है।

प्रीमियम खाद्य तेल के निर्यात की योजना


नवंबर से शुरू होने वाले नए मार्केटिंग वर्ष 2009-10 के दौरान देश से 10 हजार टन खाद्य तेल निर्यात की इजाजत देने की योजना बनाई जा रही है। खाद्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने गुरुवार को कहा कि देश की निजी कंपनियों को खाद्य तेल के पांच किलोग्राम के ब्रांडेड पैक निर्यात करने की इजाजत दी जा सकती है। विश्व के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में से एक भारत ने महंगे खाद्य तेलों का निर्यात जारी रखा हुआ है लेकिन यह निर्यात नियंत्रण के तहत है। ज्यादातर सस्ते खाद्य तेलों की देश में खपत रहती है। अधिकारी ने बताया कि यह प्रस्ताव जल्द ही मंजूरी के लिए अंतरमंत्रालयीय समिति के सामने रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि देश से उतने ही खाद्य तेल के निर्यात की इजाजत होगी, जितने तेल के निर्यात की इजाजत इस महीने खत्म होने वाले मार्केटिंग वर्ष 2008-09 में थी। इस वर्ष 85,00 टन का निर्यात किया जा चुका है और बाकी इस महीने के अंत तक किए जाने की संभावना है। पिछले महीने ही केंद्र सरकार ने ब्रांडेड कंज्यूमर पैक में खाद्य तेल के निर्यात की समय सीमा 31 अक्टूबर से बढ़ाकर सितंबर 2010 कर दी थी। हालांकि सरकार ने यह घोषणा नहीं की थी कि नए विपणन वर्ष में कितना खाद्य तेल निर्यात किया जाएगा। सोल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी। वी. मेहता ने कहा कि निर्यात से खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन इससे किसानों को तिलहन का अच्छा भाव मिल पाएगा क्योंकि प्रीमियम खाद्य तेलों का निर्यात होगा। उन्होंने कहा कि कंज्यूमर पैक्स का निर्यात मुख्य रूप से विदेशों में रहने वाले भारतीयों को किया जाएगा। भारत प्रमुख रूप से सरसों, नारियल और मूंगफली का तेल अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, यूरोप व अन्य देशों को करता है। भारत की खाद्य तेल की वार्षिक खपत करीब 150 लाख टन है और इसका आधे से भी ज्यादा आयात वह मलेशिया और इंडोनेशिया से करता है

स्टार्च और पोल्ट्री की मांग से मक्का में तेजी का रुख


स्टार्च और पोल्ट्री निर्माताओं की मांग से मक्का में तेजी का रुख बना हुआ है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पैदावार घटने से उत्तर भारत के स्टॉर्च और पोल्ट्री व्यवसायी मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश से खरीद कर रहे हैं। नवंबर महीने में कर्नाटक में नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी, साथ ही महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी आवक बढ़ेगी। लेकिन कुल उत्पादन में कमी की आने की आशंका से मक्का में तेजी की संभावना है। आंध्र प्रदेश की निजामाबाद मंडी के मक्का व्यापारी पूनम चंद गुप्ता ने बताया कि आंध्र प्रदेश की मंडियों में मक्का की दैनिक आवक बढ़कर 40 हजार बोरियों की हो गई है लेकिन घरेलू और उत्तर भारत की मांग से भाव सुधरकर 890 रुपये प्रति क्विंटल (बिल्टी कट) हो गए हैं। दिल्ली पहुंच मक्का के सौदे 1060-1070 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हो रहे हैं। पिछले दस दिनों में आंध्र प्रदेश से दिल्ली के लिए मक्का के दो रैक के सौदे हुए हैं। मध्य प्रदेश की इंदौर लाइन से भी दिल्ली के लिए अच्छे सौदे हो रहे हैं।जून-जुलाई और अगस्त महीने के मध्य तक बारिश की कमी से आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मक्का की बुवाई में कमी आई थी। जबकि कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में बाढ़ से फसल को नुकसान हुआ है। मैसर्स गोपाल ट्रेडिंग कंपनी के राजेश अग्रवाल ने बताया कि नवंबर महीने में कर्नाटक में नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी। लेकिन कुल उत्पादन में कमी की आशंका से भाव में गिरावट की संभावना नहीं है। महाराष्ट्र की मंडियों में मक्का की दैनिक आवक बढ़कर 18-20 हजार बोरियों की हो गई है लेकिन स्टार्च मिलों की अच्छी मांग से मक्का के भाव बढ़कर 880-900 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।अमेरिकी ग्रेन काउंसिल में भारत के प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि अभी तक केंद्र सरकार खरीफ फसलों के उत्पादन के अनुमान जारी नहीं किये हैं लेकिन प्रतिकूल मौसम का प्रभाव मक्का की फसल पर पड़ा है। इसीलिए उत्पादक मंडियों में मक्का के भाव पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 10 फीसदी तेज हैं। हाजिर बाजार तेज होने के कारण ही वायदा में भी तेजी देखी जा रही है। एनसीडीईएक्स पर दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध के भाव गुरुवार को 19 रुपये बढ़कर 964 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए। नवंबर महीने में लगभग सभी उत्पादक राज्यों की मंडियों में आवक का दबाव बन जाएगा लेकिन स्टार्च और पोल्ट्री फीड निर्माताओं की मांग से मौजूदा भावों में ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का के भाव बढ़ रहे हैं। पिछले दो दिनों में रुपये के मुकाबले डॉलर सुधरा है। अगर रुपये के मुकाबले डॉलर और मजबूत होता है तो आगामी दिनों में भारत से निर्यात मांग बढ़ने की संभावना भी है

Thursday, October 22, 2009

गन्ने की नई मूल्य प्रणाली घोषित

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। केंद्र सरकार ने गन्ने की नई मूल्य प्रणाली की घोषणा की है। इससे गन्ने के मूल्य में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी होने की संभावना है। 'एफएंडआर' नाम की इस मूल्य प्रणाली में गन्ने की खेती की लागत के साथ किसानों के जोखिम और लाभ भी जोड़े जाएंगे। प्रणाली को केंद्रीय मंत्रिमडल ने पहले ही मंजूरी दे दी है, जिसे अध्यादेश के जरिए लागू किया जाएगा। संसद के शीतकालीन सत्र में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के लिए पेश किया जाएगा।

फेयर एंड रिम्यूनरेटिव नाम की इस मूल्य प्रणाली की जानकारी केंद्रीय कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने बुधवार को यहां पत्रकारों को दी। उन्होंने बताया कि इससे गन्ना किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा। गन्ना मूल्य को लेकर केंद्र व राज्य सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं। केंद्र के न्यूनतम वैधानिक मूल्य [एसएमपी] को स्वीकार करने की जगह राज्य सरकारें अपने स्तर पर राज्य समर्थित मूल्य [एसएपी] घोषित करती हैं। इससे अलग-अलग राज्यों में चीनी की लागत में घट बढ़ होती है।
हालांकि केंद्र की इस नई प्रणाली को राज्य किस हद तक मानेंगे, इस पर संदेह भी है। पंजाब ने गन्ने का मूल्य [एसएपी] जहां 185 रुपये प्रति क्विंटल तय कर दिया है, वहीं उत्तर प्रदेश में अभी तक घोषणा नहीं हो पाई है। इससे गन्ना किसान और चीनी मिलें परेशान हैं। पेराई सत्र शुरू होने के बावजूद राज्य की चीनी मिलों में चीनी उत्पादन शुरु नहीं हो सका है।
गन्ना मूल्य तय करने की इस प्रणाली पर उत्तर प्रदेश के किसान नेता सुधीर पंवार ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए। लेकिन इस प्रणाली के अमल के बाद ही इसकी खामियों का पता चल सकेगा। लेकिन अगर इस प्रणाली में किसानों के जोखिम और खेती के लाभ को भी जोड़ा गया है तो इसकी प्रशंसा की चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों के हाल पर गठित स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही लागू कर देना चाहिए था।
कृषि मंत्री ने एक अन्य सवाल के जवाब में बताया कि चीनी की कमी को देखते हुए सरकार ने तैयार चीनी के आयात की अवधि दिसंबर, 2010 तक बढ़ा दी है। यह अवधि नवंबर, 09 में समाप्त होने वाली थी

दिवाली के बाद खाद्य तेलों में अब और नरमी के आसार

नई दिल्ली : पिछले साल के मुकाबले करीब 20 से 25 फीसदी नीचे चल रही खाद्य तेलों की कीमतों में आने वाले कुछ दिनों में और नरमी के आसार बन रहे हैं। विदेश से हो रहे जबरदस्त आयात की वजह से घरेलू बाजार में इस साल खाद्य तेलों की कीमतें निचले स्तर पर बनी हुई हैं। यहां तक कि दिवाली पर मांग में आई तेजी से भी तेलों की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हो सकी और शादी-विवाह के सीजन में भी भाव में तेजी आने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल्स ट्रेडर्स एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता के मुताबिक, 'दिवाली के बाद अगले कुछ दिनों में मांग में गिरावट आती है। इस वजह से शादियों के शुरू होने तक खाद्य तेलों की कीमतों में चार-पांच रुपए की गिरावट आ सकती है। शादियों का सीजन शुरू होने जा रहा है। ऐसे में मांग में कुछ तेजी जरूर पैदा होगी, हालांकि भरपूर सप्लाई होने की वजह से कीमतों के मौजूदा स्तर पर ही रहने की उम्मीद है।'

इस वक्त दिल्ली में हर महीने करीब 25,000 टन खाद्य तेल की आवक हो रही है। कारोबारियों के मुताबिक तिलहन की नई फसल बाजार में आनी शुरू हो चुकी है। इससे आने वाले दिनों में बाजार में खाद्य तेलों की भरपूर मात्रा मौजूद रहेगी। वेजिटेबल ऑयल के दिल्ली के एक कारोबारी के मुताबिक, 'दिवाली के खत्म होने के बाद दो दिनों में ही खाद्य तेलों में पांच से छह रुपए प्रति किलो की कमी आ चुकी है। तिलहन की फसलें तैयार हैं और बाजार में मांग के कम होने और सप्लाई बढ़ने से कीमतों में तीन से चार रुपए और कमी हो सकती है।' खाद्य तेलों के बारे में कोटक सिक्योरिटी ने अपनी हालिया जारी की गई रिपोर्ट में कहा है कि रिफाइंड सोयाबीन ऑयल के नवंबर वायदा में स्थिरता के साथ निकट अवधि में गिरावट के संकेत दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक रिफाइंड सोयाबीन तेल का नवंबर वायदा 435 रुपए प्रति 10 किलो और इसके बाद 430 रुपए प्रति 10 किलो के स्तर पर भी पहुंच सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दिवाली के खत्म होने के साथ ही शादियों के सीजन तक मांग में कमी रहने की आशंका है। कारोबारियों के मुताबिक दिवाली के दौरान हर साल खाद्य तेलों की मांग में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी होती है। राजधानी वेजिटेबल ऑयल सप्लायर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट सत्यनारायण अग्रवाल के मुताबिक, 'दिवाली के बाद भले ही शादियों का सीजन शुरू होना है, लेकिन इसके साथ ही बाजार में खाद्य तेलों की आवक भी बढ़नी है। इसके अलावा दिल्ली में शादियों के सीजन में खाद्य तेलों की मांग में पांच से सात फीसदी का ही इजाफा होता है। ऐसे में बाजार में मौजूद स्टॉक पर्याप्त है और कीमतें कम से कम इस स्तर पर बनी रहेंगी।' पिछले साल नवंबर से इस साल सितंबर तक देश में 70 लाख टन से ज्यादा खाद्य तेलों का आयात हो चुका है। इस साल सितंबर में ही करीब आठ लाख टन तेल आयात हुआ है जो सामान्य से करीब दो लाख टन ज्यादा है। इस वक्त रिफाइंड सोयाबीन ऑयल इंदौर की कीमत 435 रुपए प्रति 10 किलो से लेकर 440 रुपए बनी हुई है। इसी तरह से मस्टर्ड तेल दादरी की कीमत 520 रुपए से 530 रुपए और क्रूड पाम ऑयल कांडला की कीमत 315-320 रुपए प्रति 10 किलो पर है। कॉटनसीड ऑयल हरियाणा की कीमत भी 390 रुपए प्रति 10 किलो के स्तर पर बनी हुई है।

Wednesday, October 21, 2009

Edible oil import bill may cross over Rs 27,000 cr

MUMBAI: India's import of vegetable oils has risen to a new peak and touched nearly 80-lakh tonnes for first 11 months of the current oil year 2008-09.

Considering the arrival of ships lined up during October 09, the total import will cross 86.0-lakh tonnes valued at over Rs 27,000-crore, next to crude petroleum products bill, the Solvent Extractors' Association of India (SEA) President, Mr Ashok Sethia , said in a statement here.

India's import of vegetable oils during September 2009 has already set a new record and reported at 9,05,192 tonnes compared to 6,67,916-tonnes for September 08, registering a jump of 35 per cent, Mr Sethia said.

Import of vegetable oils during September 09 was the highest import for any given month since import was allowed under OGL in 1994. Overall import of vegetable oil during November 08 to September 09 jumped by 47 per cent to 7,975,683 tonnes from 5,429,24 7-tonnes for the same period last year.

The main reasons for increasing import are - disparity in domestic seed crushing; increasing per capita consumption of edible oils with rise in income; high price elasticity - lower price has boosted the demand and consumption; zero import duty on crude edible oil and very nominal duty on refined edible oils coupled with low international prices and depreciation of the dollar against Rupee by 5 per cent in recent months, Mr Sethia said

India soybean ends lower on arrivals, overseas mkt


MUMBAI, Oct 20 (Reuters) - India soybean futures closed lower on Tuesday weighed by arrivals in the domestic spot market and lower overseas markets, analysts said.

The most-traded soybean Indore November contract NSBX9 closed 1.3 percent lower at 2,064 rupees per 100 kg, after hitting an intra-day low of 2,053 rupees.

"Arrivals have started and is putting pressure on prices," said Veeresh Hiremath, an analyst with Karvy Comtrade in Hyderabad.

"Market is anticipating prices to be pressured further on likely rise in arrivals in coming weeks," said Hiremath. Prices are expected to trade in the range of 2,040-2,080 rupees.

Malaysian crude palm oil futures, which guides the domestic market, edged down 0.8 percent, reversing early gains, amid renewed concerns over demand after cargo surveyors announced weak exports in the first 20 days of the month, traders said.

Refined Soy Oil under weak dollar risk


2009-10-21 12:28:13

Refined Soybean Oil (November contract) futures closed lower on account of huge stock of imported edible oils and lower demand at retail ends.

Import of vegetable Oils during the month of September 2009 has set a new record at 8.65 lakh tonnes, up by 39% as compared to 6.23 lakh tonnes for September 2008.

Overall import of vegetable oil during the November 2008 to September2009 was 75.70 lakh tonnes, up by 57% from 48.22 lakh tonnes for the same period of last year.

The benchmark November contract on NBOT Exchange (Indore), Ref Soy oil futures closed lower Rs 5.60 at Rs 438.40/10 Kg on Tuesday, from its high of the day (444.60) and touched a low of MYR 437.20/10 kg.

Technical Analysis

Ref Soy Oil Prices (NCDEX November Contract) closed lower at 443.60 per 10 Kg on Tuesday; its high of the day was 446.75 levels and touched a low 437.50 level.

Prices closed above its 10 days and below its 20 days EMA. 14-Days RSI is at 52.56.

Outlook

Refined soy oil futures are expected to trade lower on account of strong INR against US Dollar, which is in favour of importers of edible oils. Huge stock of imported edible oil in first 10 months of current oil marketing year as compared to last year during the same period and decision of continue to import of crude edible oil at 0% also in favor of bears in the market.

Courtesy: Angel Commodities

Trains collide near Mathura, at least 21 dead

Wed, Oct 21 02:11 PM

Onlookers stand at the site of a train accident on the outskirts of the northern...Enlarge Photo Onlookers stand at the site of a train accident on the outskirts of the northern...

Wed, Oct 21 02:11 PM

A speeding passenger train rammed into another waiting near Mathura city station early on Wednesday, killing at least 21 people and injuring several others, officials said.

The impact of the collision left a couple of compartments of the trains mangled, and rescue workers used cutting machines to reach passengers trapped inside.

The accident occurred when a speeding Goa Sampark Kranti Express rammed into the Mewar Express waiting near the Mathura city station. Both trains were headed to New Delhi.

A local government official said 21 bodies had been recovered.

"Over 20 people who were critically injured have been admitted in different hospitals," D.C. Shukla told Reuters.

It was not immediately clear how the two trains came to be on the same tracks.

(Reporting by Alka Pande; Editing by Krittivas Mukherjee and Alex Richardson
)

Tuesday, October 20, 2009

India rapeseed output may dip 5-7 pct in 2009/10


Tue Oct 20, 2009 3:19pm IST

* India's rapeseed output may fall 5-7 pct

* Warm weather, dry soil, water scarcity to hit output


NEW DELHI, Oct 20 (Reuters) - India's rapeseed output may fall up to 7 percent as warm, dry weather has hit sowing, but the estimate may change after the government announces its wheat purchase price, which will influence farmers' choice of crops.

Planting of early-sown grades of rapeseed has fallen sharply in Rajasthan, the main producing state, because of low soil moisture and abnormally high temperatures.

"The delay in planting could lower rapeseed output by 5-7 percent, and may push cooking oil imports up by 10 percent," said Jyoti Kanda, director of Sriganganagar-based trading firm Kanda Edible Oil, whose estimates are keenly watched by traders.

Kanda, the president of the North Rajasthan Oil Millers and Traders Association, an oilseed crushers' body, told Reuters the estimates of lower output and higher imports were based on the state farm department's initial outlook for the crop.

Traders said lower Indian output may boost imports of palm oil and support Malaysian palm oil futures, which hit a five-week high on Monday.

The worst June-September monsoon since 1972 and warm weather have delayed planting and stirred worries about irrigation as only a third of the state's reservoirs have enough water.

An edible oils trader said the sowing was likely to pick up within a few days, as the temperature was likely to dip below 30 degrees Celsius from 32 to 36 degrees in recent weeks.

Govindlal Patel, who has held senior positions in industry bodies, said traders were keenly watching the progress of rapeseed planting in the next three weeks.

"It's too early to comment on how production ultimately turns out. It could even be higher than the initial estimates, if here farmers plant oilseeds instead of wheat," Patel said.

The government is expected to shortly announce the price at which it will purchase wheat from farmers, which will help them decide whether to plant wheat or rapeseed.

Last week, a farm official from Rajasthan said rapeseed was sown over a 2 percent area in the state so far, because of the high temperatures as compared to the normal 30 percent.

Rajasthan has set a target of 2.6 million hectares for the rapeseed crop this season, down 3.7 percent from 2.7 million hectares last year.

The state farm official said rapeseed was expected to be sown over an area of about 2.5 million hectares in the 2009/10 crop year.

India, the world's fourth biggest producer of the rapeseed, the main winter sown oilseed crop, produced 7.4 million tonnes in 2008/09, up 28 percent from 5.8 million tonnes previous year.

India's vegetable oil imports are projected to soar to a record 8.5 million tonnes in 2008/09 from 6.3 million tonnes in the previous year.

FACTBOX-Key facts about India's rapeseed crop


Tue Oct 20, 2009 3:24pm IST

Oct 20 (Reuters) - India's worst monsoon in almost four decades has delayed sowing of rapeseed in the biggest crop region, dashing traders' hopes that a drought-diminished summer harvest would encourage higher winter planting.

The Soybean Processors Asociation of India has scaled down its output estimate 11.3 percent to 9.72 million tonnes for the 2009/10 crop year.

In August, traders said India's soybean output might fall 9 to 19 percent because of poor rains in central India, the main producing region.

Rapeseed sowing has been delayed by a month due to high temperatures, inadequate soil moisture and lack of water in reservoirs in the main producing region.

Traders expected the delay in sowing could cut the ouput of rapeseed, the main winter sown oilseed crop, by 5-7 percent. See related story

For a graphic on India's rapeseed output

Here are some key facts about the Indian rapeseed crop.

- India is the world's fourth biggest rapeseed producer, contributing 13 percent of global output of 56 million tonnes in 2008/09.

- The European Union is the top producer with a 36 percent share, followed by Canada (24 percent) and China (22 percent).

- India produced 7.4 million tonnes of rapeseed in the crop year 2008/09, up 28 percent from 5.8 million tonnes in previous year.

- Rapeseed has the highest oil content (35-40 percent) among India's nine main oilseeds that include soybean, groundnut and sunflower.

- Early maturing rapeseed crop is sown from mid-Septmember to October, while the sowing of late maturing varieties continues until mid-November. It is harvested February onwards.

- The northern state of Rajasthan accounts for 47 percent of India' rapeseed output, followed Punjab and Haryana jointly contributing around 14 percent, Madhya Pradesh and Chattisgarh at 13 percent and Gujarat at 7 percent.

- Rapeseed oil is consumed mainly in northern and eastern India as cooking oil, and used as food preservatives in southern states.

- Rapeseed oil meets about 15 percent of edible oil demand of India, the world's leading importer of vegetable oils.

- India's vegetable oil imports, comprising edible oils and hydrogenated fats, are expected to hit an all-time high of 8.5 million tonnes in 2008/09 against 6.3 million tonnes in 2007/08.

* Rapeseed output in 2008/09............... 7.4 mln tonnes

* Oilseeds output in 2008/09.28 mln tonnes

* Total rapeseed area....27-28 mln hectares

* Average yield per hectare.........1179 kg

* Rapeseed oil share in edible oil demand.......15 percent

* Oil recovery from rapeseed..35-40 percent

* Per-capita edible oil consumption...............11-12 kg

* Share in global oilseed output...............13 percent

* Indian share in global edible oil demand....9.33 percent

* Total demand for edible oils in 2007/08....13 mln tonnes

* Local edible oil supplies in 2007/08.......5 mln tonnes

* India vegetable oil marketing year..............Nov-Oct

* Oilseed crop year...............July-June

Source: Government of India and trade (Editing by Clarence Fernandez)

Dry spell in India's Rajasthan may hit rapeseed crop

JAIPUR, India, - High temperatures, a lack of soil moisture and a lack of water in reservoirs have delayed sowing of rapeseed by a month in India's main producing state of Rajasthan, state government officials said on Friday.

Traders said the delay was likely to hit India's rapeseed output, about half of which is grown in Rajasthan and which meets about 15 percent of edible oil demand in the world's leading importer of vegetable oils.

"Rapeseed has only been sown in about 2 percent area till date as against about 30 percent sowing normally due to abnormally high temperatures and lack of moisture in the soil this year," Harbans Singh Yadav, additional director in the state farm department, told Reuters.

Rapeseed output in India, the world's fourth-biggest producer, was 7.4 million tonnes in the 2008/09 crop year, up 28 percent from the previous year. Of this, Rajasthan produced 3.5 million tonnes.

India's rapeseed crop year runs from July to June. Early-sown varieties of the oilseed are normally planted from mid-September to mid-October in the state, while late-maturing grades are sown until mid-November.

This year the sowing has just begun and would only pick up as temperatures start falling, Yadav said.

"Rapeseed is expected to be sown in about 2.5 million hectares area this year as sowing will continue up to October end," Yadav said.

Last month, the state farm department had set a target of 2.6 million hectares area coverage for the rapeseed crop this season, down 3.7 percent from 2.7 million hectares last year.

V.S. Nain, another official from Sriganganagar, the producing hub of Rajasthan, said in the past 4-5 years sowing of the oilseed has picked up around October 15, when the average temperature dips to 25-28 degrees.

"Usually, 30 to 40 percent sowing gets completed in Sriganganagar area by this time. However, it is yet to begin this year," Lal said, adding that the output could be lower than the farm department's current estimate of 3.1 million tonnes.

73 people arrested in anti-adulteration drive in UP



13:10 HRS IST
Lucknow, Oct 20 (PTI) Fifty nine people have been arrested during a special drive launched across the state to check sale of adulterated food items during the festival season.

Fourteen more people have been arrested for allegedly dealing in spurious medicines, under the Drugs and Cosmetics Act.

"Raids were carried out at 371 places, 1,197 samples were collected and 59 people were arrested on charges of adulteration," principal secretary Food and Drug Control Department, Desh Deepak Varma said.

Over 1.18 lakh litres of adulterated mustard oil, 14,582 kilogram khoya, 4,065 kg ghee and 11,380 kg milk and milk products were seized during the raids, he said.

"Of this 37,425 litres of adulterated mustard oil was recovered in Lucknow itself," he said.

Varma said that a huge quantity of adulterated items were recovered at various bus stations across the state

पंजाब में गन्ने के दाम तय

उड़ीसा के किसानों ने भी की गन्ने के दाम बढ़ाने की मांग, दाम न मिला तो नहीं उगाएंगे गन्ना

बीएस संवाददाता / चंडीगढ़/बहरामपुर October 19, 2009
पंजाब सरकार ने सोमवार को गन्ने की एडवांस, मीडियम और लेट वेराइटी की किस्मों के लिए राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) क्रमश: 200 रुपये, 195 रुये और 190 रुपये प्रति क्विंटल रखने की घोषणा की है।
यह मूल्य पेराई सत्र 2010-11 के लिए लागू होगा। राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि इस बढ़ी हुई दर से गन्ना किसानों और चीनी उद्योग दोनों को ही फायदा होगा। उन्होंने कहा कि अब किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले गन्ने की खेती करने की जरूरत है।
उन्होंने किसानों से और ज्यादा क्षेत्रफल में खेती करने का अनुरोध किया, जिससे उच्च गुणवत्ता वाली चीनी का उत्पादन किया जा सके। मालूम हो कि सरकार ने वर्ष 2009-10 में गन्ने के लिए पहले ही 180 रुपये, 175 रुपये और 170 रुपये प्रति क्विंटल राज्य समर्थित मूल्य घोषित कर दिया है।
उधर दक्षिण उड़ीसा के गंजाम जिले के किसानों ने गन्ने के दाम में बढ़ोतरी करने का अनुरोध किया है, जिससे उन्हें गन्ने की बुआई का क्षेत्रफल बढ़ाने में मदद मिल सके। मंगलवार को स्थानीय चीनी मिल अक्षा कोआपरेटिव शुगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड से बातचीत के दो दिन पहले गंजाम जिला गन्ना उत्पादक संघ के बैनर तले गन्ना उत्पादकों ने यह मांग उठाई है।
उन्होंने धमकी दी है कि अगर कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाती है तो वे गन्ना उत्पादन ठप कर देंगे। गंजाम जिले के करीब 20,000 किसान गन्ना उत्पादन से जुड़े हुए हैं और इस मिल को गन्ने की आपूर्ति करते हैं।

यूपी में गन्ने के सरकारी मूल्य पर मिलों व किसानों में खींचतान

चीनी मिलों ने 160 रुपये एसएपी तय करने की मांग की जबकि किसानों ने 280 रुपये का दाम मांगा अक्टूब से शुरू वर्ष 2009-10 पेराई सीजन उत्तर प्रदेश की की चीनी मिलें गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय होने का इंतजार कर रही है। राज्य की मिलें जहां 160 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने का एसएपी तय करने की मांग कर रही है वहीं किसान 200 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा दाम तय करने की मांग कर रहे हैं। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार एसएपी 180 रुपये प्रति क्विंटल तय किए जाने की संभावना है। पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब में राज्य सरकारें पहले ही एसएपी तय कर चुकी हैं।उत्तर प्रदेश चीनी मिल एसोसिएशन के सचिव श्याम लाल गुप्ता ने बताया कि पहली नवंबर के बाद ही मिलें पेराई शुरू करेंगी। मिलों ने सरकार से गन्ने का एसएपी 160 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की है। उम्मीद है कि अगले आठ-दस दिनों में भाव तय हो जाएगा। गन्ने के उत्पादन में कमी और आयात महंगा होने से नए सीजन में चीनी की कीमतें फुटकर में 30 रुपये किलो से नीचे आने के आसार नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग के एक उच्च अधिकारी के अनुसार वर्ष 2009-10 के लिए गन्ने का एसएपी 180 रुपये प्रति क्विंटल तय किए जाने की संभावना है। धामपुर शुगर मिल्स लिमिटेड के प्रमोटर डायरेक्टर और चेयरमैन विजय गोयल ने बताया कि वर्ष 2008-09 में चीनी का उत्पादन 150 लाख टन से कम हुआ था लेकिन नए सीजन में उत्पादन बढ़कर 160 लाख टन होने की संभावना है। देश की सालाना खपत करीब 225 लाख टन की है इसलिए नए सीजन में भी करीब 40-50 लाख टन चीनी का आयात करना पड़ेगा। ऐसे में आगामी दिनों में घरेलू बाजार में चीनी की तेजी-मंदी अंतरराष्ट्रीय भाव के हिसाब से ही तय होगी।लंबे समय से गन्ना किसानों के हितों की लड़ाई लड़ रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष वी। एम. सिंह ने बताया कि चीनी के दाम पिछले साल के मुकाबले करीब 75 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। दिल्ली के थोक बाजार में इस समय चीनी के दाम 3100 रुपये प्रति क्विंटल ऊपर हैं जबकि पिछले साल इन दिनों भाव 1750 रुपये प्रति क्विंटल थे। जून-जुलाई और अगस्त के मध्य तक मानसून कमजोर रहा था, जिसके कारण किसानों की लागत बढ़ी है। सितंबर में राज्य के कई क्षेत्रों में बाढ़ से फसल को नुकसान हुआ है। ऐसे में राज्य सरकार को गन्ने का एसएपी बढ़ाकर 280 रुपये प्रति क्विंटल तय करना चाहिए। पिछले साल राज्य सरकार ने गन्ने का एसएपी 140-145 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।मुजफ्फरनगर के गुड़ व्यापारी हरि शंकर मूंदड़ा ने बताया कि कोल्हू संचालक किसानों से गन्ने की खरीद 190-210 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर कर रहे हैं। नवंबर महीने में गन्ना मिलों में पेराई शुरू होने के बाद गन्ना कीमतों को लेकर कोल्हू संचालकों और चीनी मिलों में प्रतिस्पर्धा होने से गन्ने की मौजूदा कीमतों में और भी इजाफा होने की संभावना है।

भारी बिकवाली से लाल मिर्च में और गिरावट संभव

गुंटूर में लाल मिर्च का स्टॉक ज्यादा होने और मध्य प्रदेश की मंडियों में नई फसल आने से पिछले एक सप्ताह में भाव पांच फीसदी घट गए। गुंटूर में लाल मिर्च का करीब 22-23 लाख बोरी (एक बोरी 45 किलो) का स्टॉक बचा हुआ है। उधर मध्य प्रदेश की मंडियों में रोजाना दो से तीन हजार बोरी की नई आवक शुरू हो चुकी है। इसीलिए घरेलू मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। हाजिर में आई गिरावट से वायदा बाजार में भी पिछले दस दिनों में करीब चार फीसदी का मंदा आया है।मैसर्स स्पाइस ट्रेडिंग कंपनी के प्रोप्राइटर विनय बूबना ने बताया कि गुंटूर में इस समय लाल मिर्च का करीब 22-23 लाख बोरी का स्टॉक बचा है। मंडी में दैनिक आवक करीब 30-35 हजार बोरियों की हो रही है लेकिन मध्य प्रदेश में नई फसल आने से घरेलू मांग कम हो गई है। जिससे लाल मिर्च की कीमतों में पिछले एक सप्ताह में करीब 300 रुपये की गिरावट आ चुकी है। सोमवार को मंडी में 334 क्वालिटी की लाल मिर्च के भाव घटकर 5600-5700 रुपये, ब्याड़गी क्वालिटी के 5800-6300 रुपये, तेजा क्वालिटी के भाव 6600-7000 रुपये और फटकी क्वालिटी के 2000-4000 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। आंध्र प्रदेश में किसानों द्वारा हल्दी, दलहन और कॉटन की बुवाई ज्यादा करने से लाल मिर्च की बुवाई में कमी आने की आशंका है। हाजिर में गिरावट के कारण ही एनसीडीईएक्स में दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में पिछले दस दिनों में चार फीसदी की गिरावट आ चुकी है। 9 अक्टूबर को दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में भाव 5927 रुपये प्रति क्विंटल थे जबकि 17 अक्टूबर को मुहर्त सौदे में भाव घटकर 5676 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। बिकवाली के दबाव से इसमें और भी गिरावट की आशंका है। इंदौर के लालमिर्च व्यापारी खजोर मल प्रजापति ने बताया कि नई लाल मिर्च की दो से तीन हजार बोरी की आवक शुरू हो चुकी है। मौसम साफ बना हुआ है इसलिए चालू महीने के आखिर तक आवक बढ़कर 40-50 हजार बोरी की हो जाएगी। पैदावार में पिछले साल से बढ़ोतरी की संभावना है। पिछले साल मध्य प्रदेश में 35 लाख बोरी का उत्पादन हुआ था। लाल मिर्च व्यापारी मांगीलाल मुंदड़ा ने बताया कि आंध्र प्रदेश में नई फसल की आवक फरवरी- मार्च महीने में बनेगी। स्टॉक 22-23 लाख बोरी बचा हुआ है। घरेलू और निर्यात मांग कमजोर है इसलिए नई फसल के समय करीब 15 लाख बोरी का स्टॉक बचने की संभावना है। मुंबई स्थित मैसर्स अशोक एंड कंपनी के डायरेक्टर अशोक दत्तानी ने बताया कि अगले महीने बांग्लादेश की मांग निकलने की उम्मीद है। बांग्लादेश की मांग कैसी रहती है, इसी पर लाल मिर्च की तेजी-मंदी निर्भर करेगी। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से अगस्त के दौरान लाल मिर्च निर्यात में 30 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 67,500 टन का ही हुआ है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में निर्यात 96,250 टन का हुआ था।

यूरोप में पाम तेल पर सब्सिडी पाने की कोशिश में मलेशिया

मलेशिया का कोशिश है कि बायो फ्यूल बनाने के लिए यूरोप में आयात होने वाले पाम तेल पर सब्सिडी दी जाए। इसके लिए वह पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी प्रमाणित कराने की कोशिश करेगा। अध्ययनों से पता चलता है कि पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों में कमी यूरोप के मानकों के अनुरूप होती है। लेकिन इसके नतीजों में काफी भिन्नता पाई गई है। मलेशिया चाहता है कि यूरोप में पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी पर आम सहमति बने। इससे वहां के पाम तेल पर सब्सिडी मिलने लगेगी। मलेशियाई पाम ऑयल काउंसिल के चीफ एक्जीक्यूटिव यूसुफ बेसीरोन का कहना है कि अगले दशक में ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का लक्ष्य बढ़ सकता है।स्थानीय पाम तेल मिलों को अपनी प्रोसेसिंग में तकनीकी सुधार करना होगा ताकि नए मानक हासिल किए जा सकें। पाम तेल के लाइफ-साइकिल आंकलन से पता चलता है कि फॉसिल फ्यूल (जैसे क्रूड ऑयल, कोल) के मुकाबले पाम की फसल उगाने से लेकर उपभोक्ताओं तक बायो फ्यूल पहुंचने तक ग्रीन हाउस गैसों में कितनी कमी आती है। बेसीरोन के अनुसार पूरी दुनिया में अनुसंधानकर्ताओं ने विभिन्न तरीकों से ग्रीन हाउस गैसों में कमी का आकलन किया है। इन अध्ययनों के अनुसार बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों में कमी के बारे में न्यूनतम 19 फीसदी का अनुमान लगाया गया है।अधिकतम 72 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की बात कही गई है। इन अध्ययनों में इतना भारी अंतर के कारण बायोफ्यूल के संबंध में कानून और मानक बना रही अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए यह तय करना खासा मुश्किल है कि पाम तेल और अन्य तिलहन फसलों से आखिर कितनी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में आती है। यूरोपीय संघ के प्रस्तावित दिशानिर्देश के अनुसार वर्ष 2010 तक बायोफ्यूल से गैस उत्सर्जन में कम से कम 35 फीसदी (फॉसिल फ्यूल के मुकाबले) की कमी आनी चाहिए। वर्ष 2018 तक यह लक्ष्य बढ़कर 60 फीसदी हो जाएगी। यूरोपीय संघ में हुई शुरूआती अध्ययन के अनुसार पाम तेल से बने बायो फ्यूल से सिर्फ 19 फीसदी गैस उत्सर्जन कम होता है। इतनी कम कमी का एक कारण यह है कि पाम के फल की पेराई के समय उसमें से मीथेन गैस निकल जाती है। बेसीरोन के अनुसार मलेशिया 51 फीसदी तक गैस कमी का लक्ष्य हासिल कर सकता है। इसके लिए प्रोसेसिंग तकनीक बदलनी होगी। देश में इस समय 96 फीसदी प्लांट में मीथेन गैस जमा करने की तकनीक नहीं है। फिलहाल 35 फीसदी गैस कटौती का लक्ष्य पाने की जरूरत है।

किसानों से छल

भारतीय किसानों ने कमरतोड़ मेहनत, पक्के इरादे और नई तकनीकों के सहारे देश को खाद्यान्न, चीनी तथा अन्य कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर बनाया था, परंतु सरकार ने किसानों को कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य तो दूर लागत मूल्य भी नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि किसान साहुकारों के चंगुल में फंसने को मजबूर हुए, जिसकी इतिश्री लाखों किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आई। सरकार किसानों के उत्थान के लिए कमीशन और समितियां बनाती रही, जिनकी रिपोर्ट आज भी सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं। आज देश खाद्यान्न से लेकर चीनी, दाल, खाद्य तेल सभी के लिए आयात पर निर्भर है, जो सचमुच देश के लिए कलंक है।
वर्ष 2006-07 में देश ने चीनी उत्पादन में कीर्तिमान बनाया और दिसंबर 2008 तक ट्रांसपोर्ट सब्सिडी देकर न्यूनतम दामों पर चीनी को निर्यात किया जाता रहा। 6 माह बाद जून 2009 के बाद देश उच्चतम भाव पर चीनी आयात करने पर विवश है और खुले बाजार में चीनी की महंगाई बढ़ती चली गई है। वास्तव में, आयात-निर्यात का यह खेल नेताओं और नौकरशाहों को खूब भाता है क्योंकि इसमें अनुबंधित शर्तो में 12.5 प्रतिशत तक के कमीशन की मान्यता है। चीनी उद्योग में रिकवरी पर कोई वाजिब नियंत्रण नहीं है, घटतौली बदस्तूर जारी है और अवैध रूप से गन्ना खरीद की प्रक्रिया जोरो पर है। अघोषित रूप से 10 से 15 प्रतिशत चीनी उत्पादन किया जा रहा है- न खरीद टेक्स, न एक्साइज, न उत्पादन लागत, न आयकर। इसी अकूत राशि से मिल-मालिकान क्षेत्र के छुटभैये नेताओं से लेकर अधिकारियों और राजनेताओं को काबू में रखते हैं। चीनी के भाव ऊंचे होने के कारण कुछ गोदाम सील हुए, लेकिन यह कार्रवाई नामचारे को ही हुई। अगर ईमानदारी से धरपकड़ हो तो 10-15 लाख टन चीनी प्राप्त हो सकती है, जिससे चीनी आयात भी घटेगा और अवैध रूप से चीनी उत्पादन पर भी अंकुश लगेगा, लेकिन ऐसी तत्परता और इरादा दूर-दूर तक नजर नहीं आता।
उत्तर प्रदेश देश का लगभग 50 प्रतिशत गन्ना पैदा करता है। मात्र सहारनपुर, मुजफ्फरनगर एवं मेरठ जिले का गन्ना उत्पादन संपूर्ण महाराष्ट्र से अधिक है जो देश में सबसे अधिक चीनी का उत्पादन करता है। वर्तमान दशक में उत्तर प्रदेश की पिराई क्षमता में 90 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज उत्तर प्रदेश की दैनिक पिराई क्षमता सर्वाधिक यानी महाराष्ट्र से भी अधिक है। फिर चीनी उत्पादन कम क्यों है? गन्ने की रिकवरी पर सतर्कता और गन्ना माफिया पर नियंत्रण की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में प्रति किसान अधिकतम भूमि सीमा लगभग 15 हेक्टेयर और अधिकतम गन्ना आपूर्ति सीमा 5500 क्विंटल है। इससे अधिक आपूर्ति गन्ना आयुक्त की विशेष आज्ञा से ही हो सकती है। परंतु चीनी मिलों द्वारा प्रति किसान 4 से 14 लाख क्विंटल की सप्लाई वाले मामले आज उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालयों में लंबित हैं। यह कैसे संभव हुआ?
इन धांधलियों में गन्ना विभाग व प्रशासन पूर्णतया लिप्त है। घटतौली भी इन सबके बिना संभव नहीं। दुर्भाग्य की बात है कि केंद्र और प्रदेश सरकारों की भी इसमें मिलीभगत स्पष्ट है। केंद्र सरकार के गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 एवं राज्य सरकार के उत्तर प्रदेश गन्ना खरीद व विपणन ऐक्ट 1954 के अनुसार 14 दिन से अधिक गन्ना मूल्य भुगतान पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज अनिवार्य है। आज तक विधानसभा व संसद पटल या गन्ना संबंधी कमीशन या कमेटी की किसी रिपोर्ट में भी बकाया गन्ना मूल्य की राशि पर देय ब्याज नहीं दर्शाया गया। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार के गन्ना मंत्री ने सदन में बकाया पर सूद दिलाने की घोषणा भी की थी पर यह घोषणा थोथी साबित हुई। चीनी मिलों पर संकट के नाम पर 880 करोड़ रुपए बफर स्टाक सब्सिडी और चीनी निर्यात के लिए 840 करोड़ रुपए ट्रांसपोर्ट सब्सिडी देकर सस्ती चीनी निर्यात कराकर देश में चीनी संकट पैदा किया गया है और आज उच्चतम भावों पर भारी मात्रा में चीनी आयात करना दर्शाता है कि सरकार के पास सोच एवं नियोजन का पूरा अभाव है।
सूखाग्रस्त किसान सरकार से पूछना चाहता है क्या कोई राहत की बूंद उस पर भी टपकेगी और यदि हां तो कब? 2006-07 से 2008-09 तक देश में बकाया गन्ना मूल्य राशि मात्र 1023.25 करोड़ बताई गई है, जबकि इस अवधि में मात्र उत्तर प्रदेश की सूद रहित बकाया राशि लगभग 1500 करोड़ रुपए है। सरकार एक तरफ तो उद्योगपतियों के लिए राहत पैकेज ला रही है, वहीं किसानों को उनका बकाया गन्ना मूल्य दिलाने की कोशिश नहीं कर रही है। सरकार सूखे के संकट की इस घड़ी में भी किसानों को बकाया और सूद नहीं दिला सकती तो किसान की सहायता का झूठा नाटक बंद करे।
[प्रीतम चौधरी : लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

In sugarcane pricing, an end to run of the mills on cards



NEW DELHI: In a desperate bid to avoid arrears estimated at Rs 11,000 crore and an annual increase of Rs 2,500 crore on purchase of levy sugar purchase from mills, the government may recast the sugarcane pricing regime through an ordinance, amending the Essential Commodities Act (ECA) within the next fortnight। Under the regime, the concept of statutory minimum price (SMP) would give way to a F&RP (fair and remunerative price), pegged at 60% higher than the SMP, in order to increase domestic cane production. The change would hit the sugar industry, which will have to pay higher prices to farmers from now on. Worse, in glut years, payment of a phenomenally high F&RP for cane could spell disaster for sugar mills. The ECA, however, falls under Schedule 9 of the Constitution and changes cannot be challenged by the industry, according to experts. But the implications are graver for other commodities: in the long run, the government could also end up paying more by way of food subsidy as there would be pressure to extend the new concept to other crops as well. The ECA amendment is likely to be done, with retrospective effect, through a ‘clarification’ to section 3 (3 c) of the ECA. This section requires that the government price levy sugar obtained from producers be based on a minimum price for sugarcane, besides some other elements of cost of sugar. Levy sugar is that part of the commodity (20% of the total output from the current sugar year: October 2009 to September 2010) from mills that has to be compulsorily supplied at subsidised price to the government for meeting its welfare needs. Powers under another key law, the sugarcane control order (SCO) could also be undermined. Clause 5 (a) of the SCO refers to the payment of additional sugarcane price to the growers through half of the profits made by mills on free sale sugar (FSS) in the open market. The changes planned seek to exclude the state advised price (SAP) and the additional cane price from the price of sugarcane for calculation of levy price, retrospectively from 1955. Further, an amendment to the SCO also aims to make state governments bear the burden of difference in levy price between one based on the SAP (usually 3-4 times higher than the Centre’s floor price) and the SMP, although a 2004 apex court order empowered states such as UP to announce the SAP. These changes would effectively nullify all dues on levy sugar price to mills with retrospective effect, besides doing away with future dues by withdrawing the “minimum” price for cane, the basis of the apex court’s ruling on higher levy sugar price to mills. Mills took to court the Centre’s decision to not base levy sugar price on the higher SAP paid to sugarcane farmers in some states. A March 31, 2008 Supreme Court ruling reinforced the right of the mills to claim levy sugar price based on SAP and not just the SMP. But far worse are the implications for the food subsidy bill if the SMP is replaced with an F&RP. The latter could well be cited as a precedent by other commodity sectors such as wheat, rice, edible oilseeds, cotton, and pulses, highly distorting the market and leading to record agflation and food inflation, besides ballooning the food subsidy bill.

Monday, October 19, 2009

मूंगफली में बड़ी तेजी के आसार

19 October 2009
देशभर में पैदावार में भारी गिरावट के चलते इस साल मूंगफली सस्ती होने के आसार नहीं हैं। राजस्थान में नई फसल की आवक बढ़ने के बावजूद मूंगफली में लगातार मजबूती इसी धारणा को पुख्ता कर रही है। बाजार की मनोवृत्ति को देखते हुए अगले महीने मूंगफली के भाव 3,000 रुपये के पार होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि मूंगफली की पैदावार खरीफ और रबी सीजन दोनों में ही होती है, लेकिन 75 फीसदी उत्पादन रबी सीजन के दौरान ही होता है। इसलिए खरीफ सीजन में पैदावार मूंगफली व्यापारियों के बहुत मायने रखती है। यह देखते हुए मूंगफली में मजबूती आने की धारणा बनी हुई है।उल्लेखनीय है कि खरीफ की फसल आने से पहले निर्यात में कमी तथा पॉम ऑयल सस्ता होने से मूंगफली तेल पर दबाब बना रहा था। इस वजह से कुछ ही मौकों पर मूंगफली 3,000 रुपये क्विंटल से ऊंचे भावों पर बिक पाई थी। मनमाफिक दाम नहीं मिलने से परशान किसानों ने खरीफ सीजन में मूंगफली की बुवाई कम की है। वहीं रही-सही कसर कमजोर मानसून ने पूरी कर दी। इससे देशभर में खरीफ सीजन के दौरान मूंगफली का उत्पादन 40 फीसदी तक घटने की आशंका है। इस कारण मूंगफली की लगातार मांग निकल रही है। यह भी महत्वपूर्ण है कि रकबा घटने के अंदेशे से जुलाई के दौरान राजस्थान की मंडियों में मूंगफली के भाव दस फीसदी सुधरकर 2,500 से 2,800 रुपये क्विंटल हो गए थे। उसके भाव नई फसल की आवक से भाव थोड़े नीचे आए लेकिन इस महीने मूंगफली में फिर तेजी का रुख बन गया और अब नई मूंगफली भी 2300 से 2400 रुपये क्विंटल बिक रही है। यही रुख वायदा सौदों में देखने को मिल रहा है। एनसीडीईएक्स में नवंबर वायदा मूंगफली के भाव इस महीने डेढ फीसदी बढ़कर 2633 रुपये क्विंटल हो गए हैं। अब सिकाई वालों की मांग बढ़ने की संभावना से मूंगफली में पांच-सात फीसदी का और सुधार होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।इस बीच मूंगफली तेल में सुधार से भी मूंगफली में मजबूती की धारणा को बल मिला है। उल्लेखनीय वर्ष 2008-09 के दौरान देश में मूंगफली का कुल उत्पादन 73 लाख टन होने का अनुमान है, जो कि पूर्व वर्ष की तुलना में करीब बीस फीसदी कम है। रकबा घटने व कमजोर मानसून के चलते इस साल पैदावार में और भारी कमी की आशंका है। इस साल खरीफ में मूंगफली का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में 41.35 लाख हैक्टेयर से घटकर 33.11 लाख हैक्टेयर रह जाने का अनुमान है। ऐसे में उम्मीद के अनुरूप निर्यात में सुधार हो जाता है तो मूंगफली में बड़ी तेजी देखने को मिल सकती है। देश से कुल मूंगफली निर्यात का 15 फीसदी यूरोपीय देशों को होता है। इसमें इस साल बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है। पिछले वर्ष देश से 2.50 से 2.75 लाख टन मूंगफली का निर्यात होने का अनुमान है। यह देखते हुए मूंगफली सस्ती होने के आसार नहीं है।

Wednesday, October 14, 2009

एमपी में प्लांटों की मांग से सोयाबीन के भाव मजबूत


मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बंपर आवक होने के बावजूद भाव पिछले साल से ऊपर चल रहे हैं। कारोबारियों का कहना है कि प्लांटों की मांग बनी रहने से सोयाबीन के भाव 2,050 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। प्रदेश की प्रमुख की मंडियों में करीब तीन लाख बोरी के दैनिक आवक हो रही है। जानकारों का मानना है कि प्लांटों की मांग बनी रहने से सोयाबीन के भाव में फिलहाल नरमी की उम्मीद नहीं है। लेकिन दीपावली के हफ्ते भर बाद आवक का दबाव बढ़ने की स्थिति में सोयाबीन में करीब 100 रुपये प्रति क्विंटल की कमी आ सकती है। इंदौर मंडी में करीब 20000 बोरी आवक हो रही है। वहीं प्रदेश में देवास मंडी में 35 हजार बोरी की आवक हो रही है। कारोबारियों का कहना है कि दीपावली के चलते कुछ ही दिनों में मंडियों में आवक कमजोर पड़ जाएगी। दूसरी ओर प्लांटों की मांग बनी रहेगी।इंदौर मंडी में सोयाबीन के बड़े कारोबारी प्रमोद बंसल कहते है कि भारी आवक के बावजुूद सोयाबीन के भाव में नरमी के संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। प्रमोद कहते हैं कि सभी जगह पुरान स्टॉक न के बराबर बचा है। ऐसे में गीला होने के बावजूद नया माल ऊंचे भाव पर बिक रहा है। उन्होंने कहा कि आईटीसी चौपाल द्वारा 2050 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर सोयाबीन की खरीदी की जा रही है। अक्टूबर के महीने में सोयाबीन में नरमी आने की संभावना नजर नहीं आती। इंदौर मंडी में सोयाबीन के अन्य कारोबारी संजय बंसल बताते हैं कि भाव में नरमी की उम्मीद नहीं है। प्लांटों की मांग बनी रहने से नई फसल के अच्छे दाम मिल रहे हैं। उन्होंने बताया कि नए माल में 11 से 16 प्रतिशत तक नमी की मात्रा है। संजय ने बताया कि फिलहाल सोयाबीन के भाव 1700 से 2000 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रहे हैं। लेकिन दीपावली के बाद 100 रुपये प्रति क्विंटल की मंदी की धारणा बन रही है। वहीं भोपाल मंडी में सोयाबीन के कारोबारी किशोर सचदेवा कहते हैं कि त्यौहारी मांग निकलने से नई फसल के दाम नीचे नहीं जा रहे है।

Tuesday, October 13, 2009

भारत का चीनी उत्पादन पहुंच सकता है 1.58 करोड़ टन: यूएसडीए


नई दिल्ली : गन्ने की बेहतर उपज के कारण इस सीजन में भारत का चीनी उत्पादन 7 फीसदी बढ़कर 1।58 करोड़ टन के स्तर तक पहुंच सकता है। यह बात यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) ने अपनी एक रिपोर्ट में कही है। चीनी का सीजन अक्टूबर से शुरू होकर सितंबर में खत्म होता है। ब्राजील के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले सीजन (अक्टूबर 2008 से सितंबर 2009) में भारत का चीनी उत्पादन 1.47 करोड़ टन से अधिक हो सकता है। भारत ने 2007-08 सीजन में रिकॉर्ड 2.64 टन चीनी का उत्पादन किया था।
यूएसडीए ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है, 'वर्ष 2009-10 में पिछले वर्ष के मुकाबले गन्ने की उपज बेहतर रहने की उम्मीद है।' भारत के दो प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। महाराष्ट्र में जहां चीनी उत्पादन 48 लाख टन रह सकता है। वहीं उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन बढ़कर 43 लाख टन के स्तर तक पहुंच सकता है। यूएसडीए की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के दक्षिण राज्य तमिलनाडु में भी चीनी उत्पादन बढ़कर 18 लाख टन तक जा सकता है। पिछले सीजन में यहां चीनी का कुल उत्पादन 15।5 लाख टन रहा था। हालांकि, कर्नाटक में चीनी उत्पादन के बारे में यूएसडीए की रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां उत्पादन 1 लाख टन घटकर 16 लाख टन रहेगा। गुजरात में चीनी उत्पादन 2 लाख टन बढ़कर 12 लाख टन के स्तर पर पहुंचने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी मिलों को गन्ने की सप्लाई में गुड़ निर्माताओं की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इसमें कहा गया है, 'गुड़ की असामान्य रूप से बढ़ी हुई कीमतों के कारण चालू सत्र की शुरुआत से चीनी मिलों की गन्ना आपूर्ति पर भारी दबाव रहेगा।' यूएसडीए ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा सीजन में मानसून की देरी और सूखे जैसी स्थिति होने के कारण गन्ने का पैदावार क्षेत्र घटकर 42.50 लाख हेक्टेयर रह गया। पिछले सीजन में गन्ने का पैदावार क्षेत्र 43.79 लाख हेक्टेयर था। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि पैदावार क्षेत्र घटने के कारण घरेलू बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन प्रभावित हुआ।

Sunday, October 11, 2009

सोने की डिलिवरी का रिकॉर्ड

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) ने अक्टूबर में समाप्त होने वाले सोने के सौदे की 5000 किलो की रिकॉर्ड डिलिवरी दी। ऐसा दीवाली के चलते हुआ है।

इसके पहले सोने की डिलिवरी देने का रिकॉर्ड अक्टूबर 2006 में बना था, जब एक्सचेंज ने 1893 किलो सोने की डिलिवरी दी थी। डिलिवरी की प्रक्रिया में 45 सदस्य शामिल हुए। इससे हाजिर बाजार के कारोबारियों और सोने में निवेश करने वाले निवेशकों के विश्वास का पता चलता है।

त्योहार पर उपभोक्ताओं को खाद्य तेल में थोड़ी राहत


दलहन और चीनी की कीमतों में आई तेजी से परेशान उपभोक्ताओं को दीपावली पर खाद्य तेल में कुछ राहत मिल सकती है क्योंकि खाद्य तेल कुछ सस्ते हुए हैं। थोक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले पंद्रह दिनों के दौरान करीब दो से तीन रुपये प्रति किलो की गिरावट आई है। चालू तेल वर्ष में खाद्य तेलों के आयात में 49 फीसदी की भारी बढ़ोतरी होने से घरेलू बाजार मे उपलब्धता बढ़ी है। इसके अलावा घरेलू मंडियों में सोयाबीन की आवक शुरू हो गई है। दीपावली तक मूंगफली की आवक भी शुरू हो जाएगी। हालांकि खाद्य तेलों के भाव घटने से तिलहनों के भी दाम गिर सकते हैं।दिल्ली वेजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता ने बताया कि त्योहारी सीजन के बावजूद खाद्य तेलों में उठान कमजोर है। सरसों तेल के भाव हरियाणा की दादरी मंडी में पिछले दस दिनों में 545 रुपये से घटकर 495 रुपये प्रति दस किलो रह गए। इस दौरान इंदौर में रिफाइंड सोयाबीन तेल के भाव 460 रुपये से घटकर 430 रुपये, बिनौला तेल के भाव पंजाब में 410 रुपये से घटकर 375 रुपये और राजकोट में मूंगफली तेल के भाव 670 रुपये से घटकर 650 रुपये प्रति दस किलो रह गए। क्रूड पाम तेल के भाव कांडला पोर्ट पर 335 रुपये से घटकर 305 रुपये प्रति दस किलो रह गए। फुटकर में सरसों तेल पक्की घानी के भाव करीब 58-60 रुपये, रिफाइंड सोयाबीन तेल के भाव 50-55 रुपये और आरबीडी पामोलीन के भाव 48-50 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं।खाद्य तेलों के व्यापारी संजीव गर्ग ने बताया कि घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता ज्यादा होने के कारण आयातकों ने आयात सौदे पहले की तुलना में कम कर दिए हैं। वैसे भी घरेलू मंडियों में सोयाबीन और कपास की आवक शुरू हो चुकी है तथा दीपावली तक मूंगफली की भी आवक शुरू हो जाएगी। इसलिए आगामी दिनों में खाद्य तेलों की गिरावट का असर सोयाबीन, कपास और मूंगफली की कीमतों पर पड़ने का अनुमान है। साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू तेल वर्ष के पहले दस महीनों (नवंबर से अगस्त) के दौरान भारत में 70।70 लाख टन खाद्य तेलों का रिकार्ड आयात हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 47.61 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था। अगस्त महीने में 650,603 टन खाद्य तेलों का आयात हुआ है जो कि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले चार फीसदी ज्यादा है। कुल उपलब्धता ज्यादा होने और खरीफ तिलहनों की आवक को देखते हुए आगामी दिनों में आयात में कमी आने की संभावना है।चालू खरीफ सीजन में देश में तिलहनों की कुल बुवाई में 12.35 लाख हैक्टेयर की कमी आई है। अभी तक 167.40 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 179.76 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। आंध्रप्रदेश और गुजरात में मानसून की कमी से मूंगफली की बुवाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। मूंगफली की कुल बुवाई 43.49 लाख हैक्टेयर में ही हुई जोकि पिछले साल की समान अवधि के 31.79 लाख हैक्टेयर से कम है

मलेशिया में पाम तेल के उत्पादन के साथ स्टॉक भी बढ़ने की संभावना


मलेशिया में पाम तेल का उत्पादन बढ़ने और निर्यात हल्का रहने के कारण स्टॉक और बढ़ने की संभावना है। पाम तेल का स्टॉक 152 से 157 लाख टन तक पहुंच सकता है जो पिछले फरवरी के बाद सबसे ज्यादा है। मलेशियन पाम ऑयल बोर्ड ने अगस्त में पाम तेल का स्टॉक 142 लाख टन रहने का अनुमान लगाया था। बोर्ड सितंबर तक पाम तेल उत्पादन और निर्यात का आंकड़ा अगले सप्ताह जारी कर सकता है। सिंगापुर की विदेशी कमोडिटी ब्रोकरेज फर्म के एक अधिकारी के अनुसार अगर घरेलू खपत 2.1 लाख टन रहती है और आयात 50,000 टन रहता है तो सितंबर तक कुल स्टॉक 156 लाख टन तक पहुंच सकता है। उधर पाम तेल उत्पादकों और कारोबारियों ने स्टॉक 156 से 158 लाख टन के बीच रहने की संभावना व्यक्त की है। एक प्रमुख पाम प्लांटेशन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सितंबर में पाम तेल के उत्पादन में बढ़त दर्ज की गई। पिछले सितंबर माह के दूसरे पखवाड़े में सप्लाई ज्यादा रही। हालांकि ईद के कारण कुछ दिनों उत्पादन में बाधा पैदा हुई। एक अन्य प्लांटेशन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बागानों में कटाई जोरों पर होने के कारण आगे भी उत्पादन में बढ़ोतरी होने की संभावना है। अक्टूबर से नवंबर के दौरान उत्पादन काफी ज्यादा रह सकता है। एक कारोबारी के अनुसार सितंबर के दौरान मलेशिया का पाम तेल निर्यात 12.3 लाख टन से 12.6 लाख टन के बीच रहने की संभावना है जबकि अगस्त में 13 लाख टन पाम तेल का निर्यात किया गया था। पाम तेल के प्रमुख खरीदार चीन और भारत त्योहारी सीजन के लिए पहले ही खरीद कर चुके हैं।सिंगापुर की ट्रेडिंग कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मध्य अक्टूबर में चीन से पाम तेल की खरीद सुधर सकती है क्योंकि उसे उस समय दुबारा स्टॉक जुटाने की जरूरत होगी। उत्पादन और स्टॉक में बढ़ोतरी की संभावनाओं का असर बाजार पर दिखाई दे रहा है।

जीएम सोया पर लगी रोक से यूरोप में उद्योग मुश्किल में


यूरोपियन यूनियन में जेनेटिकली मॉडीफाइड (जीएम) सोयाबीन के आयात पर लगे प्रतिबंध में यदि छूट नहीं दी गई तो उसे सोयाबीन की पर्याप्त सप्लाई मिलना मुश्किल होगा। पारंपरिक रूप से यूरोपियन यूनियन दक्षिणी अमेरिकी देशों से सोयाबीन आयात करता है लेकिन वहां फसल कमजोर होने से उत्तरी अमेरिकी देशों से सोयाबीन आयात करनी होगी। उत्तरी अमेरिकी देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात किया जा सकता है लेकिन वहां पैदा होने वाली जीएम सोयाबीन मौजूदा नियमों के चलते आयात नहीं हो सकती है। हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि यूरोपीय आयोग मौजूदा हालात में नियमों में छूट देकर समस्या का समाधान निकालेगा। कमोडिटी ट्रेडिंग फर्म अल्फ्रेड सी। टोफर के मुख्य अर्थशास्त्री क्लॉज शूमाकर ने कहा कि अमेरिकी सोया पर प्रतिबंध से इसके भावों में और तेजी आएगी और इसके भाव 30 फीसदी तक बढ़ सकते हैं। आने वाले छह महीने काफी कठिन हैं और अमेरिकी सोया आयात पर प्रतिबंध जारी रहा तो इसका कीमतों पर भारी असर पड़ेगा। उद्योग जगत से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि कारोबार में आ रहा यह व्यवधान समय रहते दूर कर लिया जाएगा। नए सीजन में अमेरिका सोयाबीन के रिकॉर्ड उत्पादन से भी राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन कारोबारियों का कहना है कि नियमों को लेकर बाजार में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।ईयू ने जीएम सोया के किसी भी आयात पर प्रतिबंध लगा रखा है। यूरोपियन यूनियन पशु आहार में उपयोग की जाने वाली सोया का आयात परंपरागत रूप से दक्षिणी अमेरिका से करता है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक पिछले अगस्त में समाप्त हुए मार्केटिंग वर्ष में यूरोप में 96 फीसदी सोयाबीन का आयात दक्षिण अमेरिका से किया गया। इस वर्ष दक्षिण अमेरिका में सोया का उत्पादन काफी घटा है क्योंकि अर्ज्ेटीना में सूखे की स्थिति के कारण सोयाबीन उत्पादन में 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा चीन में भी सोयाबीन की मांग बढ़ रही है। इसकी भरपाई करने के लिए यूरोपियन यूनियन को अगले छह महीनों में उत्तरी अमेरिकी देशों से सोया का दोगुना आयात करना होगा। मार्च में शुरू होने वाले दक्षिण अफ्रीका के नए निर्यात सीजन तक करीब 75 लाख टन सोयाबीन का आयात ईयू को करना होगा। रोटरडम एक्सचेंज में अमेरिकी सोया के भाव जनवरी में 413 डॉलर प्रति टन थे, लेकिन दक्षिण अमेरिका में मौसम प्रतिकूल रहने से जून में इसके भाव 425 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गए।

Thursday, October 8, 2009

oyabean futures fall on weak spot demand, lower global cues


New Delhi, Oct 8 Soyabean futures prices declined by 0.86 per cent today on continued offloading by traders, driven by weak overseas trend.

Market analysts said fall in soyabean prices at futures market was mostly attributed to weak trend in global markets and subdued trend at domestic spot markets.
Besides, weakening of US dollar against various currencies was another factor behind falling prices.
At the NCDEX, soyabean for November contract eased by 0.86 per cent to Rs 1,971 per quintal. The contract has an open interest in 1,09,000 lots.
Current October contract also slipped by 0.78 per cent to Rs 1,984 per quintal, with an open interest in 73,790 lots.

Groundnut production may fall by one million tonnes



GB Patel, one of the eminent oil experts in the country, said India may produce only 3.3 million tonnes of groundnut this kharif, about a million tonnes less than a year earlier because of drought which has deeply affected sowing areas across the country.

"During this kharif season productivity is under stress which may dip groundnut output by about 9-10 lakh tonnes from 4.2 million tonnes in the same season last year," Patel said. The ministry of agriculture also said that sowing area had slumped drastically this year.

Last year, the government estimated to produce 5.63 million tonnes of soya bean in the kharif season but failed to achieve the target by registering only about 4.22 million tonnes.

At present, India accounts for about 9.3% of world oilseeds production. Yet, over 45% of edible oil available in India is imported. The bulk of edible oil India imports is of Malaysian and Indonesian origin. Currently, India has approximately 320 crude edible oil refining units, 60-70% of which are small.