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Thursday, October 29, 2009
दस लाख टन और चीनी आयात की मंजूरी दे सकती है सरकार
पंजाब, हरियाणा में 261 लाख टन गेहूं उत्पादन की संभावना
Wednesday, October 28, 2009
CPO price: More positive than negative
Food prices show declining trend, says dept of consumer affairs
Wednesday, October 28, 2009 08:00 IST
Our Bureau, New Delhi
As per data collected by the department of consumer affairs of the ministry of consumer affairs, food & public distribution, the price of wheat came down by Re 1 from Rs 14 to Rs 13 per kg. Groundnut oil became cheaper by Rs 4 per litre while mustard oil recorded a decrease of Rs 5 per litre at Rs 61, down from Rs 66.
Further, Vanaspati prices registered a declining trend during the same period. Its price was Rs 51 per litre down from Rs 54. The dept also informed that the prices of pulses remained on higher side.
“In the meantime, PSUs (public sector undertaking) have contracted 3.02 lakh tonne of pulses. Out of which 2.23 lakh tonnes have arrived and 0.98 lakh tonnes have been disposed from the stocks with agencies up to October 7 2009,” the dept said in its statement.
Raid on oil depot
इस बार कम होगा गेहूं का उत्पादन
पिछले वर्ष जिले में गेहूं का उत्पादन रिकार्ड तोड़ हुआ था। दो लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल लक्ष्य की तुलना में दो लाख सात हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की बुवाई हुई थी। इसके सापेक्ष सात लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था। सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य एक हजार अस्सी रुपये निर्धारित किया था। जिला प्रशासन ने गेहूं क्रय केंद्र खोलकर किसानों का अनाज खरीद लिया। नगद धनराशि न मिलने की वजह से किसानों ने व्यापारियों के हाथ गेहूं बेच दिया। हालांकि जिला प्रशासन ने खरीद का अपना लक्ष्य पूरा कर लिया। मगर किसानों को अधिक लाभ नहीं मिला। इसके विपरीत आलू की बुवाई भी रबी फसल में होती है। दोनों की बुवाई में सिर्फ एक माह का अंतर होता है। इसलिए किसान एक फसल ही बो सकते हैं। पिछले वर्ष अधिक रिकार्ड उत्पादन की वजह रही कि आलू की बुवाई का क्षेत्रफल कम था। इसलिये रिकार्ड गेहूं का उत्पादन रहा। अब आलू का मूल्य अधिक मिलने की वजह से किसानों ने इसकी बुवाई का जिले में क्षेत्रफल बढ़ा दिया है। शासन ने आठ हजार पांच सौ हेक्टेयर जमीन में उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके विपरीत 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसकी बुवाई होने की संभावना है। इस बार शासन ने जिले में दो लाख पंद्रह हजार हेक्टेयर जमीन में गेहूं की बुवाई का लक्ष्य रखा है। उप कृषि निदेशक डा।ओमवीर सिंह ने बताया कि इस साल आलू की बुवाई अधिक हो रही है। पिछले वर्ष गेहूं फसल की बुवाई अधिक क्षेत्रफल में हुई थी।
अगले साल सितंबर तक चावल आयात पर शुल्क नहीं
सूत्रों ने बताया कि पिछले माह आयोजित एक बैठक में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में खाद्य मामलों पर गठित मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह (ईजीओएम) ने चावल से आयात शुल्क हटाने की सिफारिश की थी। मुद्रास्फीति नियंत्रण के उपायों के तहत सरकार ने 20 मार्च 2008 से 31 मार्च 2009 के बीच चावल के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी थी। हालांकि, 1 अप्रैल से आयात शुल्क को दोबारा लागू कर दिया गया था। सरकार ने चावल से आयात शुल्क हटाने का फैसला ऐसे वक्त में किया है, जब देश का आधा हिस्सा सूखे की चपेट है तो दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बाढ़ का कहर बरपा है। इन इलाकों में मुख्य रूप से चावल की खेती होती है। धान की पैदावार को नुकसान पहुंचने के बाद पिछले चार महीनों में चावल की कीमतें 25 फीसदी बढ़ चुकी हैं। इससे पहले मुखर्जी ने कहा था कि सूखे और बाढ़ के कारण इस साल चावल उत्पादन में 1।60 करोड़ टन की गिरावट आ सकती है। 2008-09 में भारत में 9.91 करोड़ टन चावल का उत्पादन हुआ था। (ई टी हिन्दी
ड्यूटी फ्री चावल आयात की सरकार ने दी मंजूरी
महंगा हो सकता है खाद्य तेल का आयात
खाद्य तेलों पर आयात शुल्क खत्म किए जाने से घरेलू थोक बाजारों में खाद्य तेल 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक सस्ते हो गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह रुख ज्यादा दिनों तक जारी नहीं रह सकता।
विशेषज्ञों ने कहा कि बाजार में अटकलें हैं कि दो महीने बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ सकती हैं। यद्यपि आयात शुल्क घटाए जाने से निजी कंपनियां आगामी महीनों के लिए और अधिक आर्डर जारी कर रही हैं, लेकिन वे मौजूदा स्तरों पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मोलभाव नहीं कर सकतीं क्योंकि जून के बाद कीमतों में तेजी आने की संभावना है।
साल्वेंट एक्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (एसईए) ने कहा है ' इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतें स्थिर हैं। हालांकि व्यापारियों का अनुमान है कि कीमतें जून के बाद बढ़ सकती हैं।' लेकिन कारोबारियों का अनुमान है कि जून के बाद तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी।
एसईए का कहना है कि अप्रैल महीने में आयातित तेल की कीमत मार्च के मुकाबले स्थिर है। आयातित आरबीडी की कीमत 6.29 फीसदी की गिरावट के साथ 53,600 रुपये टन के स्टर पर पहुंच गयी है। उसी तरह कच्चे पामऑयल की कीमत 11 फीसदी की गिरावट के साथ 46,000 रुपये प्रति टन के स्तर पर आ गयी।
मूंगफली तेल की कीमत में 7।75 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है। अब इसके भाव 65,500 रुपये प्रति टन के स्तर पर आ गये हैं। वही सूरजमुखी तेल की कीमत 69,000 रुपये प्रति टन से गिरकर 57,000 रुपये प्रति टन हो गयी है। आयात शुल्क में कटौती के बाद पहले के मुकाबले तेल का आयात ज्यादा सस्ता हो गया है
Tuesday, October 27, 2009
चावल उत्पादन में हो सकती है कमी
Saturday, October 24, 2009
Raids conducted at several places
Wheat and edible oil prices show declining trend
Friday, October 23, 2009 | ||||||
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Two members of family die of dropsy, eight taken ill
Friday, October 23, 2009
चीनी के दाम सर्वोच्च स्तर पर
किसानों की लागत बढ़ी पर पूसा धान का भाव पिछले साल के मुकाबले आधा
प्रीमियम खाद्य तेल के निर्यात की योजना
स्टार्च और पोल्ट्री की मांग से मक्का में तेजी का रुख
Thursday, October 22, 2009
गन्ने की नई मूल्य प्रणाली घोषित
नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। केंद्र सरकार ने गन्ने की नई मूल्य प्रणाली की घोषणा की है। इससे गन्ने के मूल्य में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी होने की संभावना है। 'एफएंडआर' नाम की इस मूल्य प्रणाली में गन्ने की खेती की लागत के साथ किसानों के जोखिम और लाभ भी जोड़े जाएंगे। प्रणाली को केंद्रीय मंत्रिमडल ने पहले ही मंजूरी दे दी है, जिसे अध्यादेश के जरिए लागू किया जाएगा। संसद के शीतकालीन सत्र में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के लिए पेश किया जाएगा।
हालांकि केंद्र की इस नई प्रणाली को राज्य किस हद तक मानेंगे, इस पर संदेह भी है। पंजाब ने गन्ने का मूल्य [एसएपी] जहां 185 रुपये प्रति क्विंटल तय कर दिया है, वहीं उत्तर प्रदेश में अभी तक घोषणा नहीं हो पाई है। इससे गन्ना किसान और चीनी मिलें परेशान हैं। पेराई सत्र शुरू होने के बावजूद राज्य की चीनी मिलों में चीनी उत्पादन शुरु नहीं हो सका है।
गन्ना मूल्य तय करने की इस प्रणाली पर उत्तर प्रदेश के किसान नेता सुधीर पंवार ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए। लेकिन इस प्रणाली के अमल के बाद ही इसकी खामियों का पता चल सकेगा। लेकिन अगर इस प्रणाली में किसानों के जोखिम और खेती के लाभ को भी जोड़ा गया है तो इसकी प्रशंसा की चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों के हाल पर गठित स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही लागू कर देना चाहिए था।
कृषि मंत्री ने एक अन्य सवाल के जवाब में बताया कि चीनी की कमी को देखते हुए सरकार ने तैयार चीनी के आयात की अवधि दिसंबर, 2010 तक बढ़ा दी है। यह अवधि नवंबर, 09 में समाप्त होने वाली थी
दिवाली के बाद खाद्य तेलों में अब और नरमी के आसार
नई दिल्ली : पिछले साल के मुकाबले करीब 20 से 25 फीसदी नीचे चल रही खाद्य तेलों की कीमतों में आने वाले कुछ दिनों में और नरमी के आसार बन रहे हैं। विदेश से हो रहे जबरदस्त आयात की वजह से घरेलू बाजार में इस साल खाद्य तेलों की कीमतें निचले स्तर पर बनी हुई हैं। यहां तक कि दिवाली पर मांग में आई तेजी से भी तेलों की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हो सकी और शादी-विवाह के सीजन में भी भाव में तेजी आने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल्स ट्रेडर्स एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता के मुताबिक, 'दिवाली के बाद अगले कुछ दिनों में मांग में गिरावट आती है। इस वजह से शादियों के शुरू होने तक खाद्य तेलों की कीमतों में चार-पांच रुपए की गिरावट आ सकती है। शादियों का सीजन शुरू होने जा रहा है। ऐसे में मांग में कुछ तेजी जरूर पैदा होगी, हालांकि भरपूर सप्लाई होने की वजह से कीमतों के मौजूदा स्तर पर ही रहने की उम्मीद है।'
Wednesday, October 21, 2009
Edible oil import bill may cross over Rs 27,000 cr
MUMBAI: India's import of vegetable oils has risen to a new peak and touched nearly 80-lakh tonnes for first 11 months of the current oil year 2008-09.
Considering the arrival of ships lined up during October 09, the total import will cross 86.0-lakh tonnes valued at over Rs 27,000-crore, next to crude petroleum products bill, the Solvent Extractors' Association of India (SEA) President, Mr Ashok Sethia , said in a statement here.
India's import of vegetable oils during September 2009 has already set a new record and reported at 9,05,192 tonnes compared to 6,67,916-tonnes for September 08, registering a jump of 35 per cent, Mr Sethia said.
Import of vegetable oils during September 09 was the highest import for any given month since import was allowed under OGL in 1994. Overall import of vegetable oil during November 08 to September 09 jumped by 47 per cent to 7,975,683 tonnes from 5,429,24 7-tonnes for the same period last year.
The main reasons for increasing import are - disparity in domestic seed crushing; increasing per capita consumption of edible oils with rise in income; high price elasticity - lower price has boosted the demand and consumption; zero import duty on crude edible oil and very nominal duty on refined edible oils coupled with low international prices and depreciation of the dollar against Rupee by 5 per cent in recent months, Mr Sethia said
India soybean ends lower on arrivals, overseas mkt
Refined Soy Oil under weak dollar risk
Trains collide near Mathura, at least 21 dead
Wed, Oct 21 02:11 PM
Enlarge Photo Onlookers stand at the site of a train accident on the outskirts of the northern...Wed, Oct 21 02:11 PM
A speeding passenger train rammed into another waiting near Mathura city station early on Wednesday, killing at least 21 people and injuring several others, officials said.
The impact of the collision left a couple of compartments of the trains mangled, and rescue workers used cutting machines to reach passengers trapped inside.
The accident occurred when a speeding Goa Sampark Kranti Express rammed into the Mewar Express waiting near the Mathura city station. Both trains were headed to New Delhi.
A local government official said 21 bodies had been recovered.
"Over 20 people who were critically injured have been admitted in different hospitals," D.C. Shukla told Reuters.
It was not immediately clear how the two trains came to be on the same tracks.
(Reporting by Alka Pande; Editing by Krittivas Mukherjee and Alex Richardson
)
Tuesday, October 20, 2009
India rapeseed output may dip 5-7 pct in 2009/10
FACTBOX-Key facts about India's rapeseed crop

Dry spell in India's Rajasthan may hit rapeseed crop
73 people arrested in anti-adulteration drive in UP
पंजाब में गन्ने के दाम तय
उड़ीसा के किसानों ने भी की गन्ने के दाम बढ़ाने की मांग, दाम न मिला तो नहीं उगाएंगे गन्ना
पंजाब सरकार ने सोमवार को गन्ने की एडवांस, मीडियम और लेट वेराइटी की किस्मों के लिए राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) क्रमश: 200 रुपये, 195 रुये और 190 रुपये प्रति क्विंटल रखने की घोषणा की है।
यह मूल्य पेराई सत्र 2010-11 के लिए लागू होगा। राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि इस बढ़ी हुई दर से गन्ना किसानों और चीनी उद्योग दोनों को ही फायदा होगा। उन्होंने कहा कि अब किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले गन्ने की खेती करने की जरूरत है।
उन्होंने किसानों से और ज्यादा क्षेत्रफल में खेती करने का अनुरोध किया, जिससे उच्च गुणवत्ता वाली चीनी का उत्पादन किया जा सके। मालूम हो कि सरकार ने वर्ष 2009-10 में गन्ने के लिए पहले ही 180 रुपये, 175 रुपये और 170 रुपये प्रति क्विंटल राज्य समर्थित मूल्य घोषित कर दिया है।
उधर दक्षिण उड़ीसा के गंजाम जिले के किसानों ने गन्ने के दाम में बढ़ोतरी करने का अनुरोध किया है, जिससे उन्हें गन्ने की बुआई का क्षेत्रफल बढ़ाने में मदद मिल सके। मंगलवार को स्थानीय चीनी मिल अक्षा कोआपरेटिव शुगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड से बातचीत के दो दिन पहले गंजाम जिला गन्ना उत्पादक संघ के बैनर तले गन्ना उत्पादकों ने यह मांग उठाई है।
उन्होंने धमकी दी है कि अगर कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाती है तो वे गन्ना उत्पादन ठप कर देंगे। गंजाम जिले के करीब 20,000 किसान गन्ना उत्पादन से जुड़े हुए हैं और इस मिल को गन्ने की आपूर्ति करते हैं।
यूपी में गन्ने के सरकारी मूल्य पर मिलों व किसानों में खींचतान
चीनी मिलों ने 160 रुपये एसएपी तय करने की मांग की जबकि किसानों ने 280 रुपये का दाम मांगा अक्टूब से शुरू वर्ष 2009-10 पेराई सीजन उत्तर प्रदेश की की चीनी मिलें गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय होने का इंतजार कर रही है। राज्य की मिलें जहां 160 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने का एसएपी तय करने की मांग कर रही है वहीं किसान 200 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा दाम तय करने की मांग कर रहे हैं। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार एसएपी 180 रुपये प्रति क्विंटल तय किए जाने की संभावना है। पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब में राज्य सरकारें पहले ही एसएपी तय कर चुकी हैं।उत्तर प्रदेश चीनी मिल एसोसिएशन के सचिव श्याम लाल गुप्ता ने बताया कि पहली नवंबर के बाद ही मिलें पेराई शुरू करेंगी। मिलों ने सरकार से गन्ने का एसएपी 160 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की है। उम्मीद है कि अगले आठ-दस दिनों में भाव तय हो जाएगा। गन्ने के उत्पादन में कमी और आयात महंगा होने से नए सीजन में चीनी की कीमतें फुटकर में 30 रुपये किलो से नीचे आने के आसार नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग के एक उच्च अधिकारी के अनुसार वर्ष 2009-10 के लिए गन्ने का एसएपी 180 रुपये प्रति क्विंटल तय किए जाने की संभावना है। धामपुर शुगर मिल्स लिमिटेड के प्रमोटर डायरेक्टर और चेयरमैन विजय गोयल ने बताया कि वर्ष 2008-09 में चीनी का उत्पादन 150 लाख टन से कम हुआ था लेकिन नए सीजन में उत्पादन बढ़कर 160 लाख टन होने की संभावना है। देश की सालाना खपत करीब 225 लाख टन की है इसलिए नए सीजन में भी करीब 40-50 लाख टन चीनी का आयात करना पड़ेगा। ऐसे में आगामी दिनों में घरेलू बाजार में चीनी की तेजी-मंदी अंतरराष्ट्रीय भाव के हिसाब से ही तय होगी।लंबे समय से गन्ना किसानों के हितों की लड़ाई लड़ रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष वी। एम. सिंह ने बताया कि चीनी के दाम पिछले साल के मुकाबले करीब 75 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। दिल्ली के थोक बाजार में इस समय चीनी के दाम 3100 रुपये प्रति क्विंटल ऊपर हैं जबकि पिछले साल इन दिनों भाव 1750 रुपये प्रति क्विंटल थे। जून-जुलाई और अगस्त के मध्य तक मानसून कमजोर रहा था, जिसके कारण किसानों की लागत बढ़ी है। सितंबर में राज्य के कई क्षेत्रों में बाढ़ से फसल को नुकसान हुआ है। ऐसे में राज्य सरकार को गन्ने का एसएपी बढ़ाकर 280 रुपये प्रति क्विंटल तय करना चाहिए। पिछले साल राज्य सरकार ने गन्ने का एसएपी 140-145 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।मुजफ्फरनगर के गुड़ व्यापारी हरि शंकर मूंदड़ा ने बताया कि कोल्हू संचालक किसानों से गन्ने की खरीद 190-210 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर कर रहे हैं। नवंबर महीने में गन्ना मिलों में पेराई शुरू होने के बाद गन्ना कीमतों को लेकर कोल्हू संचालकों और चीनी मिलों में प्रतिस्पर्धा होने से गन्ने की मौजूदा कीमतों में और भी इजाफा होने की संभावना है।
भारी बिकवाली से लाल मिर्च में और गिरावट संभव
गुंटूर में लाल मिर्च का स्टॉक ज्यादा होने और मध्य प्रदेश की मंडियों में नई फसल आने से पिछले एक सप्ताह में भाव पांच फीसदी घट गए। गुंटूर में लाल मिर्च का करीब 22-23 लाख बोरी (एक बोरी 45 किलो) का स्टॉक बचा हुआ है। उधर मध्य प्रदेश की मंडियों में रोजाना दो से तीन हजार बोरी की नई आवक शुरू हो चुकी है। इसीलिए घरेलू मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। हाजिर में आई गिरावट से वायदा बाजार में भी पिछले दस दिनों में करीब चार फीसदी का मंदा आया है।मैसर्स स्पाइस ट्रेडिंग कंपनी के प्रोप्राइटर विनय बूबना ने बताया कि गुंटूर में इस समय लाल मिर्च का करीब 22-23 लाख बोरी का स्टॉक बचा है। मंडी में दैनिक आवक करीब 30-35 हजार बोरियों की हो रही है लेकिन मध्य प्रदेश में नई फसल आने से घरेलू मांग कम हो गई है। जिससे लाल मिर्च की कीमतों में पिछले एक सप्ताह में करीब 300 रुपये की गिरावट आ चुकी है। सोमवार को मंडी में 334 क्वालिटी की लाल मिर्च के भाव घटकर 5600-5700 रुपये, ब्याड़गी क्वालिटी के 5800-6300 रुपये, तेजा क्वालिटी के भाव 6600-7000 रुपये और फटकी क्वालिटी के 2000-4000 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। आंध्र प्रदेश में किसानों द्वारा हल्दी, दलहन और कॉटन की बुवाई ज्यादा करने से लाल मिर्च की बुवाई में कमी आने की आशंका है। हाजिर में गिरावट के कारण ही एनसीडीईएक्स में दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में पिछले दस दिनों में चार फीसदी की गिरावट आ चुकी है। 9 अक्टूबर को दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में भाव 5927 रुपये प्रति क्विंटल थे जबकि 17 अक्टूबर को मुहर्त सौदे में भाव घटकर 5676 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। बिकवाली के दबाव से इसमें और भी गिरावट की आशंका है। इंदौर के लालमिर्च व्यापारी खजोर मल प्रजापति ने बताया कि नई लाल मिर्च की दो से तीन हजार बोरी की आवक शुरू हो चुकी है। मौसम साफ बना हुआ है इसलिए चालू महीने के आखिर तक आवक बढ़कर 40-50 हजार बोरी की हो जाएगी। पैदावार में पिछले साल से बढ़ोतरी की संभावना है। पिछले साल मध्य प्रदेश में 35 लाख बोरी का उत्पादन हुआ था। लाल मिर्च व्यापारी मांगीलाल मुंदड़ा ने बताया कि आंध्र प्रदेश में नई फसल की आवक फरवरी- मार्च महीने में बनेगी। स्टॉक 22-23 लाख बोरी बचा हुआ है। घरेलू और निर्यात मांग कमजोर है इसलिए नई फसल के समय करीब 15 लाख बोरी का स्टॉक बचने की संभावना है। मुंबई स्थित मैसर्स अशोक एंड कंपनी के डायरेक्टर अशोक दत्तानी ने बताया कि अगले महीने बांग्लादेश की मांग निकलने की उम्मीद है। बांग्लादेश की मांग कैसी रहती है, इसी पर लाल मिर्च की तेजी-मंदी निर्भर करेगी। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से अगस्त के दौरान लाल मिर्च निर्यात में 30 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 67,500 टन का ही हुआ है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में निर्यात 96,250 टन का हुआ था।
यूरोप में पाम तेल पर सब्सिडी पाने की कोशिश में मलेशिया
मलेशिया का कोशिश है कि बायो फ्यूल बनाने के लिए यूरोप में आयात होने वाले पाम तेल पर सब्सिडी दी जाए। इसके लिए वह पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी प्रमाणित कराने की कोशिश करेगा। अध्ययनों से पता चलता है कि पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों में कमी यूरोप के मानकों के अनुरूप होती है। लेकिन इसके नतीजों में काफी भिन्नता पाई गई है। मलेशिया चाहता है कि यूरोप में पाम तेल से बने बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी पर आम सहमति बने। इससे वहां के पाम तेल पर सब्सिडी मिलने लगेगी। मलेशियाई पाम ऑयल काउंसिल के चीफ एक्जीक्यूटिव यूसुफ बेसीरोन का कहना है कि अगले दशक में ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का लक्ष्य बढ़ सकता है।स्थानीय पाम तेल मिलों को अपनी प्रोसेसिंग में तकनीकी सुधार करना होगा ताकि नए मानक हासिल किए जा सकें। पाम तेल के लाइफ-साइकिल आंकलन से पता चलता है कि फॉसिल फ्यूल (जैसे क्रूड ऑयल, कोल) के मुकाबले पाम की फसल उगाने से लेकर उपभोक्ताओं तक बायो फ्यूल पहुंचने तक ग्रीन हाउस गैसों में कितनी कमी आती है। बेसीरोन के अनुसार पूरी दुनिया में अनुसंधानकर्ताओं ने विभिन्न तरीकों से ग्रीन हाउस गैसों में कमी का आकलन किया है। इन अध्ययनों के अनुसार बायो फ्यूल से ग्रीन हाउस गैसों में कमी के बारे में न्यूनतम 19 फीसदी का अनुमान लगाया गया है।अधिकतम 72 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों में कमी की बात कही गई है। इन अध्ययनों में इतना भारी अंतर के कारण बायोफ्यूल के संबंध में कानून और मानक बना रही अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए यह तय करना खासा मुश्किल है कि पाम तेल और अन्य तिलहन फसलों से आखिर कितनी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में आती है। यूरोपीय संघ के प्रस्तावित दिशानिर्देश के अनुसार वर्ष 2010 तक बायोफ्यूल से गैस उत्सर्जन में कम से कम 35 फीसदी (फॉसिल फ्यूल के मुकाबले) की कमी आनी चाहिए। वर्ष 2018 तक यह लक्ष्य बढ़कर 60 फीसदी हो जाएगी। यूरोपीय संघ में हुई शुरूआती अध्ययन के अनुसार पाम तेल से बने बायो फ्यूल से सिर्फ 19 फीसदी गैस उत्सर्जन कम होता है। इतनी कम कमी का एक कारण यह है कि पाम के फल की पेराई के समय उसमें से मीथेन गैस निकल जाती है। बेसीरोन के अनुसार मलेशिया 51 फीसदी तक गैस कमी का लक्ष्य हासिल कर सकता है। इसके लिए प्रोसेसिंग तकनीक बदलनी होगी। देश में इस समय 96 फीसदी प्लांट में मीथेन गैस जमा करने की तकनीक नहीं है। फिलहाल 35 फीसदी गैस कटौती का लक्ष्य पाने की जरूरत है।
किसानों से छल
वर्ष 2006-07 में देश ने चीनी उत्पादन में कीर्तिमान बनाया और दिसंबर 2008 तक ट्रांसपोर्ट सब्सिडी देकर न्यूनतम दामों पर चीनी को निर्यात किया जाता रहा। 6 माह बाद जून 2009 के बाद देश उच्चतम भाव पर चीनी आयात करने पर विवश है और खुले बाजार में चीनी की महंगाई बढ़ती चली गई है। वास्तव में, आयात-निर्यात का यह खेल नेताओं और नौकरशाहों को खूब भाता है क्योंकि इसमें अनुबंधित शर्तो में 12.5 प्रतिशत तक के कमीशन की मान्यता है। चीनी उद्योग में रिकवरी पर कोई वाजिब नियंत्रण नहीं है, घटतौली बदस्तूर जारी है और अवैध रूप से गन्ना खरीद की प्रक्रिया जोरो पर है। अघोषित रूप से 10 से 15 प्रतिशत चीनी उत्पादन किया जा रहा है- न खरीद टेक्स, न एक्साइज, न उत्पादन लागत, न आयकर। इसी अकूत राशि से मिल-मालिकान क्षेत्र के छुटभैये नेताओं से लेकर अधिकारियों और राजनेताओं को काबू में रखते हैं। चीनी के भाव ऊंचे होने के कारण कुछ गोदाम सील हुए, लेकिन यह कार्रवाई नामचारे को ही हुई। अगर ईमानदारी से धरपकड़ हो तो 10-15 लाख टन चीनी प्राप्त हो सकती है, जिससे चीनी आयात भी घटेगा और अवैध रूप से चीनी उत्पादन पर भी अंकुश लगेगा, लेकिन ऐसी तत्परता और इरादा दूर-दूर तक नजर नहीं आता।
उत्तर प्रदेश देश का लगभग 50 प्रतिशत गन्ना पैदा करता है। मात्र सहारनपुर, मुजफ्फरनगर एवं मेरठ जिले का गन्ना उत्पादन संपूर्ण महाराष्ट्र से अधिक है जो देश में सबसे अधिक चीनी का उत्पादन करता है। वर्तमान दशक में उत्तर प्रदेश की पिराई क्षमता में 90 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज उत्तर प्रदेश की दैनिक पिराई क्षमता सर्वाधिक यानी महाराष्ट्र से भी अधिक है। फिर चीनी उत्पादन कम क्यों है? गन्ने की रिकवरी पर सतर्कता और गन्ना माफिया पर नियंत्रण की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में प्रति किसान अधिकतम भूमि सीमा लगभग 15 हेक्टेयर और अधिकतम गन्ना आपूर्ति सीमा 5500 क्विंटल है। इससे अधिक आपूर्ति गन्ना आयुक्त की विशेष आज्ञा से ही हो सकती है। परंतु चीनी मिलों द्वारा प्रति किसान 4 से 14 लाख क्विंटल की सप्लाई वाले मामले आज उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालयों में लंबित हैं। यह कैसे संभव हुआ?
इन धांधलियों में गन्ना विभाग व प्रशासन पूर्णतया लिप्त है। घटतौली भी इन सबके बिना संभव नहीं। दुर्भाग्य की बात है कि केंद्र और प्रदेश सरकारों की भी इसमें मिलीभगत स्पष्ट है। केंद्र सरकार के गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 एवं राज्य सरकार के उत्तर प्रदेश गन्ना खरीद व विपणन ऐक्ट 1954 के अनुसार 14 दिन से अधिक गन्ना मूल्य भुगतान पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज अनिवार्य है। आज तक विधानसभा व संसद पटल या गन्ना संबंधी कमीशन या कमेटी की किसी रिपोर्ट में भी बकाया गन्ना मूल्य की राशि पर देय ब्याज नहीं दर्शाया गया। उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार के गन्ना मंत्री ने सदन में बकाया पर सूद दिलाने की घोषणा भी की थी पर यह घोषणा थोथी साबित हुई। चीनी मिलों पर संकट के नाम पर 880 करोड़ रुपए बफर स्टाक सब्सिडी और चीनी निर्यात के लिए 840 करोड़ रुपए ट्रांसपोर्ट सब्सिडी देकर सस्ती चीनी निर्यात कराकर देश में चीनी संकट पैदा किया गया है और आज उच्चतम भावों पर भारी मात्रा में चीनी आयात करना दर्शाता है कि सरकार के पास सोच एवं नियोजन का पूरा अभाव है।
सूखाग्रस्त किसान सरकार से पूछना चाहता है क्या कोई राहत की बूंद उस पर भी टपकेगी और यदि हां तो कब? 2006-07 से 2008-09 तक देश में बकाया गन्ना मूल्य राशि मात्र 1023.25 करोड़ बताई गई है, जबकि इस अवधि में मात्र उत्तर प्रदेश की सूद रहित बकाया राशि लगभग 1500 करोड़ रुपए है। सरकार एक तरफ तो उद्योगपतियों के लिए राहत पैकेज ला रही है, वहीं किसानों को उनका बकाया गन्ना मूल्य दिलाने की कोशिश नहीं कर रही है। सरकार सूखे के संकट की इस घड़ी में भी किसानों को बकाया और सूद नहीं दिला सकती तो किसान की सहायता का झूठा नाटक बंद करे।
[प्रीतम चौधरी : लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]
In sugarcane pricing, an end to run of the mills on cards
Monday, October 19, 2009
मूंगफली में बड़ी तेजी के आसार
Wednesday, October 14, 2009
एमपी में प्लांटों की मांग से सोयाबीन के भाव मजबूत
Tuesday, October 13, 2009
भारत का चीनी उत्पादन पहुंच सकता है 1.58 करोड़ टन: यूएसडीए
Sunday, October 11, 2009
सोने की डिलिवरी का रिकॉर्ड
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) ने अक्टूबर में समाप्त होने वाले सोने के सौदे की 5000 किलो की रिकॉर्ड डिलिवरी दी। ऐसा दीवाली के चलते हुआ है।
इसके पहले सोने की डिलिवरी देने का रिकॉर्ड अक्टूबर 2006 में बना था, जब एक्सचेंज ने 1893 किलो सोने की डिलिवरी दी थी। डिलिवरी की प्रक्रिया में 45 सदस्य शामिल हुए। इससे हाजिर बाजार के कारोबारियों और सोने में निवेश करने वाले निवेशकों के विश्वास का पता चलता है।
त्योहार पर उपभोक्ताओं को खाद्य तेल में थोड़ी राहत
मलेशिया में पाम तेल के उत्पादन के साथ स्टॉक भी बढ़ने की संभावना
जीएम सोया पर लगी रोक से यूरोप में उद्योग मुश्किल में
Thursday, October 8, 2009
oyabean futures fall on weak spot demand, lower global cues
Groundnut production may fall by one million tonnes
"During this kharif season productivity is under stress which may dip groundnut output by about 9-10 lakh tonnes from 4.2 million tonnes in the same season last year," Patel said. The ministry of agriculture also said that sowing area had slumped drastically this year.
Last year, the government estimated to produce 5.63 million tonnes of soya bean in the kharif season but failed to achieve the target by registering only about 4.22 million tonnes.
At present, India accounts for about 9.3% of world oilseeds production. Yet, over 45% of edible oil available in India is imported. The bulk of edible oil India imports is of Malaysian and Indonesian origin. Currently, India has approximately 320 crude edible oil refining units, 60-70% of which are small.